हुज़ूर (ﷺ) की बहन ” नीमा ” {part-6} | Prophet Muhammad’s sister Sheema

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हुजूर (स.अ) का बचपन अरब के एक देहात ” कबीला बनू सअद ” में गुज़रा, क्योंकि हज़रत हलीमा सादिया हुज़ूर (स.अ) को उनकी वालिदा से लेकर अपने घर ” कबीला बनू सअद ” में आ गई थीं _ यह उन दिनों अरब का रिवाज था कि बच्चे की पैदाइश के बाद उसे दूध पिलाने वाली औरतों के घर भेज दिया जाता था ताकि बच्चा गांव- देहात में रहकर बचपन ही से मजबूत बन जाए, फिर जब बच्चा बड़ा हो जाता तो उसे उसकी मां को वापस कर दिया जाता और इसके बदले में बच्चे के मां- बाप दूध पिलाने वाली को कुछ पैसे और तोहफे दिया करते थें…islamic story in hindi

हलीमा सादिया की नूरानी क़िस्मत कि उनकी गोद में दो जहानों के सरदार हुज़ूर (स.अ) आ गएं _ हुज़ूर (स.अ) ने बचपन में हलीमा सादिया का दूध पिया, हलीमा सादिया की एक लड़की भी थी जिसका नाम शीमा था, वह हर रोज़ शाम को अपने दूध पीते भाई हुजूर (स.अ) को गोद में उठाकर मोहल्ले की गलियों में घूमा करती थी और सबसे कहा करती थीं कि देखो ! मेरा भाई कितना खूबसूरत है…

एक दिन मोहल्ले की कुछ लड़कियां अपने छोटे छोटे भाइयों को गोद में लिए मैदान में बैठी हुई थीं_ उनमें से एक बोली ” मेरे भाई की आंखें तो देखो तुम्हारे भाई से अच्छी हैं “_ दूसरी बोली मेरे भाई के बाल तो देखो वह तुम्हारे भाई से अच्छे हैं _ तीसरी बोली मेरे भाई का जिस्म तो देखो उसका कोई मुकाबला ही नहीं कर सकता_ इतनी देर में हज़रत शीमा हुज़ूर (स.अ) को गोद में लिए उन लड़कियों के पास पहुंच गई और कहने लगीं कि ” क्या तुम लोग मेरे भाई से अपने भाइयों का मुकाबला करोगी..? यह सुनकर सब लड़कियां खामोश हो गईं, फिर उनमें से एक लड़की बोली कि ऐ शीमा ! तुम्हारे भाई का मुकाबला तो कोई भी नहीं कर सकता, अल्लाह ने तो उसे बहुत ज्यादा खूबसूरत बनाया है…

Prophet Muhammad’s sister

हलीमा सादिया के घर बहुत सी बकरियां थीं, हर रोज सुबह हज़रत शीमा उन बकरियों को चराने जंगल जाया करती थीं और शाम को वापस आतीं.. एक दिन हज़रत शीमा बकरियां चराने नहीं गई, उनकी मां हज़रत हलीमा सादिया ने शीमा से पूछा कि ” ऐ शीमा ! आज बकरियां चराने क्यों नहीं गईं ..? हज़रत शीमा ने कहा : अम्मा जान ! मैं बकरियां चराने नहीं जाऊंगी, मैं बकरियों के पीछे दौड़ दौड़ के थक जाती हूं.. हज़रत हलीमा सादिया ने कहा: बेटी ! अगर तुम बकरियां चराने नहीं जाओगी तो फिर कौन जाएगा, अपने बाप को देखो वह तो इतने बूढ़े हो चुके हैं और मेरी हालत देखो मैं तो कमज़ोरी की वजह से ज्यादा चल नहीं पाती हूं इसलिए बकरियां चराने तो तुम्हें ही जाना पड़ेगा…

https://youtu.be/K-aVmm1Uxso

हज़रत शीमा ने कहा ” अम्मा जान मैं बकरियां चराने नहीं जाऊंगी और अगर जाऊंगी तो अपने भाई मोहम्मद को लेकर जाऊंगी वरना नहीं जाऊंगी.. हलीमा सादिया ने कहा : शीमा ! तुम पागल हो गई हो तुम वहां बकरियों को संभालोगी या मोहम्मद को संभालोगी.. लेकिन हज़रत शीमा ने कहा कि अम्मा जान अगर आप मेरे छोटे भाई मोहम्मद को भेजोगी तो मैं जाऊंगी वरना मैं नहीं जाऊंगी..islamic story in hindi

हज़रत हलीमा सादिया को बड़ा ताज्जुब हुआ और अपनी बेटी शीमा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा_ शीमा ! सही-सही बताओ असल मामला क्या है..? तो शीमा ने फरमाया कि ” अम्मा जान ! एक दिन मैं अपने भाई मोहम्मद को लेकर बकरियां चराने गई थी तो उस दिन मैंने तीन चीज़ें बहुत अजीब देखीं..

हज़रत हलीमा ने पूछा : तुझे क्या अजीब नज़ आया था ? शीमा ने जवाब दिया कि अम्मा जान ! जिस दिन मैं अपने भाई मुहम्मद को लेकर बकरियां चराने गई थी उस दिन बहुत तेज धूप थी लेकिन मैं जैसे ही घर से बकरियों को लेकर बाहर निकली तो मेरे ऊपर एक बादल ने साया कर लिया और जब तक मैं अपने भाई मोहम्मद को लिए रही एक बादल का साया बराबर मेरे ऊपर रहा और मुझे उस दिन ज़रा भी धूप नहीं लगी…

दूसरी चीज़ जो मैंने अजीब देखी वह ये थी कि कि जब मैं बकरियों को लेकर जंगल में पहुंची तो मैं एक पेड़ के साए में अपने भाई मुहम्मद को लेकर बैठ गई, मैंने देखा कि मेरी बकरियां बहुत जल्दी जल्दी घास चर रही हैं और फिर सारी बकरियां आकर मुझे घेर कर बैठ गई_ वह बकरियां मेरे भाई मोहम्मद का चेहरा देखने लगी_ मैं भी अपने भाई का चेहरा देखती रही और मेरी बकरियां भी मेरे भाई का चेहरा देखती रही तो अम्मा जान ! उस दिन मुझे बकरियों के पीछे दौड़ना नहीं पड़ा…

तीसरी चीज जो मैंने सबसे अजीब देखी वह यह थी कि जब मैं उस पेड़ के नीचे बैठी थी तो उधर से कुछ इसाई लोग गुज़रे उन्होंने मेरे भाई को देखा तो पूछने लगें कि इस बच्चे की आंखों में ये लाल लाल धारियां हमेशा रहती हैं या सिर्फ आज हैं.. मैंने कहा मेरे भाई के ये धारियां हमेशा रहती हैं_ यह सुनकर उन लोगों के चेहरे का रंग बदल गया और उन्होंने मेरे हाथों से मेरे भाई मोहम्मद को अपनी गोद में लिया और उसे प्यार करने लगें और मुझसे कहने लगे कि ऐ लड़की ! यह लड़का हमें दे दो, ये आने वाली नस्लों का नबी हैं, हम अपनी किताबों में इसके बारे में पढ़ते आ रहे हैं, यह आगे चलकर बहुत बड़ा इंसान बनेगा, सारी दुनिया इसके पीछे चलेगी.. तो अम्मा जान जब उन लोगों ने मेरे भाई की तारीफ की तो मुझे बहुत अच्छा लगा…

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हज़रत शीमा हुज़ूर (स.अ.) से बहुत मोहब्बत करती थी और उन्हें हर वक्त गोद में लिए मोहल्ले की गलियों में घूमा करती थीं और अपने भाई मुहम्मद के लिए शायरी पढ़ पढ़ कर अल्लाह से दुआएं करती थी कि ऐ अल्लाह ! मेरे भाई मोहम्मद को सलामत रखना और बड़ा होकर इसे सबका सरदार बनाना, या अल्लाह ! मेरे भाई मोहम्मद को ऐसी इज्ज़त देना कि दुनिया में ऐसी इज्ज़त किसी को ना मिली हो, ऐ अल्लाह ! मेरे भाई से जो लोग नफरत करें आप उन्हें हलाक व बर्बाद कर देना…

दिन गुज़रते गए, हज़रत शीमा भी बड़ी हो गई और अल्लाह के रसूल भी बड़े हो गए और अपने घर मक्का आ गए, इसी तरह इस बात को सालों साल गुजर गए और अल्लाह के रसूल को अल्लाह की तरफ से नबी बना दिया गया फिर मक्का की ज़िंदगी के बाद हुज़ूर (स.अ.) ने मदीना की तरफ हिजरत फरमाई और फिर मदीना में रहते हुए काफिरों से बहुत सी जंगे हुई…

जब ” खैबर की जंग ” हुई तो इस जंग में मुसलमानों को फतह हासिल हुई और ख़ैबर के यहूदी क़ैदी बनाकर अल्लाह के रसूल के सामने पेश किए गएं , अल्लाह के रसूल उस वक्त अपने खेमे में कुछ सहाबा किराम के साथ बैठे हुए थें तभी एक सहाबी खेमे के अंदर आएं और कहा कि ” ऐ अल्लाह के रसूल ! बाहर एक औरत खड़ी है वह कह रही हैं कि मैं तुम्हारे रसूल की बहन हूं ??

यह सुनकर हुज़ूर (स.अ.) को बहुत ताज्जुब हुआ कि मैं तो अपने बाप का एकलौता लड़का, ना मेरा कोई भाई ना बहन यह मेरी कैसी बहन है जो इस बात का दावा कर रही है.. हुज़ूर (स.अ.) ने उन सहाबी से कहा कि उस औरत को अंदर भेज दो, जब वह औरत अंदर आई तो ये कोई और नहीं बल्कि हुज़ूर (स.अ.) की बहन शीमा थीं, वो बहुत बूढी़ हो चुकी थीं इसलिए हुज़ूर (स.अ.) उन्हें पहचान नहीं पाएं क्योंकि बचपन से अब तक पूरे 58 साल गुजर चुके थें..।

इसलिए हुज़ूर (स.अ.) ने हज़रत शीमा से पूछा कि ” तुम कौन हो मैंने आपको पहचाना नहीं..” फिर हज़रत शीमा ने हुज़ूर (स.अ.) को सब कुछ याद दिलाया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! बचपन में हलीमा सादिया के घर में मैं ही आपको सारा दिन गोदी उठाए मोहल्ले में घूमा करती थी और अपनी सहेलियों से कहा करती थी मेरे भाई को देखो क्या उससे ज़्यादा खूबसूरत आज तक तुमने किसी को देखा है…?

हज़रत शीमा हुज़ूर (स.अ.) को बचपन की बहुत सी बातें बताती जा रही थीं लेकिन हुज़ूर (स.अ.) को कुछ भी याद नहीं आ रहा था, आखिर में हज़रत शीमा ने अपने कंधे पर से चादर हटाते हुए कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल ! शायद आपको याद हो कि आपने बचपन में मेरे कंधे में एक बार बहुत तेज काटा था उसका निशान आज तक मेरे कंधे पर पड़ा हुआ है वह निशान देखते ही हुज़ूर (स.अ.) को सब कुछ याद आ गया और फिर उठकर अपनी बहन को अपने पास बिठाया, हुज़ूर (स.अ.) ने अपनी बहन के लिए अपनी चादर बिछा दी…

हज़रत शीमा ने हुज़ूर (स.अ.) की यह शान शौकत देखी कि सहाबा इकराम का इतना बड़ा लश्कर हुज़ूर (स.अ.) के आगे पीछे चलता है तो हज़रत शीमा को अपने बचपन की वो दुआएं याद आने लगीं जो वो अल्लाह से अपने भाई मोहम्मद के लिए किया करती थीं, वह हुज़ूर से कहने लगीं कि ” ऐ मेरे भाई ! मैं बचपन में आपको गोद लेकर गलियों में घूमाया करती थी और एक शायरी पढ़ पढ़कर अल्लाह से दुआएं मांगा करती थी कि ऐ अल्लाह ! मेरे भाई मोहम्मद को सलामत रखना और बड़ा होकर उसे सबका सरदार बनाना, या अल्लाह ! मेरे भाई मोहम्मद को ऐसी इज्ज़त देना कि दुनिया में ऐसी इज्ज़त किसी को ना मिली हो, ऐ अल्लाह ! मेरे भाई से जो लोग नफरत करें आप उन्हें हलाक व बर्बाद कर देना…

यह कहकर हज़रत शीमा की आंखों में आंसू आ गए और कहने लगी कि ऐ अल्लाह के रसूल ! आज मैंने अपनी दुआ को कबूल होते देख लिया, हुज़ूर ने उन्हें दिलासा दिया और फिर फरमाया है मेरी प्यारी बहन ! अगर आप मेरे पास रहना चाहो तो मैं इसका इंतजाम करवाता हूं और अगर अपने घर जाना चाहो तो मैं तुम्हें आज़ाद करता हूं तुम जा सकती हो..

हज़रत शीमा ने कहा_ ऐ अल्लाह के रसूल ! अगर मैं अकेली अपने इलाके में वापस गई तो लोग मुझे ताने देंगे कि खुद तो आज़ाद होकर चली आई और गांव मोहल्ले वालों को कैद में ही रहने दिया, हुज़ूर (स.अ.) ने फरमाया : शीमा ! जाओ मैंने तुम्हें और तुम्हारे पूरे क़बीले वालों को आज़ाद कर दिया…

हुज़ूर ने अपनी बहन के साथ ऐसा प्यारा सुलूक करके करके सारी दुनिया को दिखा दिया कि देखो ! बहनो की ऐसे इज्ज़त की जाती है…islamic story in hindi


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