जब हुज़ूर (ﷺ) को बीबी खदीजा ने निकाह का पैगाम भेजा |Bibi Khadija Marriage

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Bibi Khadija Marriage

हुज़ूर (ﷺ) की उम्र जब 25 साल हुई तो हज़रत खदीजा ने अपना कुछ तिजारती सामान हुज़ूर (ﷺ) को देकर ” शाम शहर ” की तरफ भेजा, हज़रत खदीजा ने हुज़ूर (ﷺ) के साथ अपने एक गुलाम ” मैसरा ” को कर दिया, ” मैसरा गुलाम ” ने रास्ते में हुज़ूर (ﷺ) के साथ बहुत सारी अजीब व गरीब चीज़ें देखीं_

उन्होंने देखा कि पूरे रास्ते भर दो फरिश्तों ने हुज़ूर (ﷺ) पर बादलों का साया कर रखा है जिसकी वजह से उन्हें कोई धूप नहीं लग रही है, इसी तरह ” शाम मुल्क ” में एक ईसाई राहिब ने जब हुज़ूर (ﷺ) को उस पेड़ के नीचे बैठा देखा कि जहां सिर्फ नबी ही बैठ सकता था, अगर कोई भी आम इंसान उस पेड़ के नीचे बैठता तो उसके साथ कोई ना कोई मुसीबत ज़रूर आ जाती_ Bibi Khadija Marriage

तो उस राहिब ने जब हुज़ूर (ﷺ) को उस पेड़ के नीचे आराम से बैठा देखा तो उसने ” मैसरा गुलाम ” से कहा कि ऐ लड़के ये तुम्हारे साथ आया आदमी कोई आम इंसान नहीं है बल्कि ये आने वाली नस्लों का नबी है, ये वही इंसान है कि जिसका सारी दुनिया इंतज़ार कर रही है और उस नबी के ज़ाहिर होने का वक्त करीब आ चुका है_

इसी तरह हुज़ूर (ﷺ) जब इस तिजारती सफ़र से वापस लौटें तो आपकी सवारी काफिले में सबसे आगे थी, इसलिए हुज़ूर (ﷺ) जल्द ही मक्का पहुंच गएं और बाकी काफिले वाले पीछे ही रह गएं_ जिस वक्त हुज़ूर (ﷺ) मक्का में दाखिल हुएं तो वो दोपहर का वक्त था और हज़रत खदीजा उस वक्त अपने घर की छत पर कुछ काम कर रही थीं कि अचानक उनकी नज़र एक काले बादल पर पड़ी कि जिसे दो फरिश्तों ने अपने हाथों में उठाए रखा था और वो दो फरिश्ते इस काले बादल के ज़रिए किसी इंसान पर साया किए हुए थें, वो इंसान अपने ऊंट पर बैठा धीरे-धीरे मक्का के अंदर दाखिल हो रहा था, दूरी की वजह से हज़रत खदीजा उस इंसान को पहचान ना सकीं_

इसलिए जब वो ऊंट करीब पहुंचा तो हज़रत खदीजा बहुत हैरान हुईं, क्योंकि उस ऊंट पर जो इंसान बैठा था वो कोई और नहीं बल्कि हमारे हुज़ूर (ﷺ) थें, कि जिन पर दो फरिश्तों ने काले बादलों से साया कर रखा था_

हज़रत खदीजा ये देख बहुत हैरान हुई और जब हुज़ूर (ﷺ) घर पहुंचें और हज़रत खदीजा के सामने सारा तिजारती सामान रखा तो बीबी खदीजा ने हुज़ूर (ﷺ) से कहा कि वो ” मैसरा गुलाम ” कहां हैं ? तो हुज़ूर (ﷺ) ने जवाब दिया कि अभी काफिला पीछे है, उन्हें आने में कुछ वक्त लगेगा और ” मैसरा गुलाम ” उसी काफिले के साथ हैं, तो हज़रत खदीजा ने कहा कि आप फिर से वापस जाएं और ” मैसरा गुलाम ” को बुलाकर लाएं_

हज़रत खदीजा ने ये बात हुज़ूर (ﷺ) से इसलिए कही थी क्योंकि वो दोबारा उसी मंज़र को देखना चाहती थीं कि आखिर अब इन पर फिर से फरिश्ते साया करेंगे या नहीं ? इसलिए जब हज़रत खदीजा ने हुज़ूर (ﷺ) को कहा कि आप पहले ” मैसरा गुलाम ” को बुलाकर लाएं तो हुज़ूर (ﷺ) उसी वक्त घर से बाहर निकल गएं_

बाहर दोपहर की तेज़ धूप फैली हुई थी, लेकिन हुज़ूर (ﷺ) जैसे ही बीबी खदीजा के हुकुम पर घर से निकलें तो अचानक उन्हीं दो फरिश्तों ने फिर से हुज़ूर (ﷺ) पर एक काले बादल से साया कर दिया और हुज़ूर (ﷺ) को ज़रा भी धूप ना लगी_

बीबी खदीजा अपने साथ मक्का की कुछ औरतों को लेकर जल्दी से छत पर चढ़ गई और फिर सब औरतों ने ये मंज़र अपनी आंखों से देखा कि दो फरिश्ते हुज़ूर (ﷺ) पर बादलों से साया किए हुएं हैं_ और फिर थोड़ी देर बाद हुज़ूर (ﷺ) ” मैसरा गुलाम ” को लेकर बीबी खदीजा के घर पहुंचें और तिजारती सामान का पूरा हिसाब हज़रत खदीजा के सामने पेश किया_

हज़रत खदीजा को इस बार अपनी तिजारत में इतना ज़्यादा नफा हुआ था कि आज तक उन्हें कभी भी अपनी तिजारत से इतना ज्यादा नफा हासिल नहीं हुआ, और बीबी खदीजा ने हुज़ूर (ﷺ) को बढ़ाकर- चढ़ाकर उनकी उजरत दी_

शाम को हज़रत खदीजा ने अपने गुलाम ” मैसरा ” से कहा कि ऐ मैसरा ! दोपहर के वक्त मैंने तुम्हारे साथी मोहम्मद के बारे में एक बहुत अजीब व गरीब चीज़ देखी, वो ये कि जिस वक्त वो मेरे घर की तरफ तेज धूप में वापस लौट रहे थें तो मैंने देखा कि दो फरिश्ते उन पर साया किए हुए हैं और उन्हें धूप नहीं लगने दे रहे हैं, तो ऐ मैसरा ! क्या तुमने भी अपने इस तिजरती सफर में अपने साथी मोहम्मद के बारे में कुछ अजीब चीज़ें देखीं ?

तो ” मैसरा गुलाम ” ने जवाब दिया कि ऐ हमारी सैय्यदा ! आप पूछ रही हैं कि कोई अजीब चीज़ मैंने देखी, बल्कि मैंने तो सारे रास्ते भर उनके बारे में हज़ारों अजीब व गरीब चीज़ें देखीं और जो दो फरिश्तों के बारे में आप बता रही हैं तो उन फरिश्तों को तो मैंने उसी वक्त से देखा था जब हम दोनों मक्का से निकले थें_

ऐ हमारी सैय्यदा ! शाम मुल्क में एक ईसाई राहिब ने जब मेरे साथी मोहम्मद को एक ऐसे पेड़ के नीचे बैठा देखा कि जहां नबी के अलावा आज तक कोई ना बैठ सका तो उस राहिब ने मुझसे कहा कि ऐ लड़के ! तुम्हारे साथी मोहम्मद कोई आम इंसान नहीं हैं बल्कि वो तो आने वाली नस्लों के नबी हैं, और ये आखिरी नबी होंगे कि जिनका सारी उम्मते इंतज़ार कर रही हैं_ ये सुनकर मुझे बहुत हैरानी हुई_

” मैसरा गुलाम ” हज़रत खदीजा के सामने हुज़ूर (ﷺ) की तारीफें करते जा रहे थें और हज़रत खदीजा बहुत गौर से उनकी बातें सुन रही थीं_ हुज़ूर (ﷺ) के साथ पेश आने वाली अजीब व गरीब बातें सुनकर हज़रत खदीजा के अंदर हुज़ूर (ﷺ) की मोहब्बत बैठ गई और उन्होंने चाहा कि मैं हुज़ूर (ﷺ) से निकाह कर लूं_

हज़रत खदीजा के पहले ही दो निकाह हो चुके थें और दोनों शौहरों की वफात हो गई थी, इसलिए हज़रत खदीजा एक बेवा औरत की ज़िंदगी गुज़ार रही थीं, अल्लाह ने उन्हें माल व दौलत बहुत अता फरमाया था, इसलिए वो अपना तिजारती सामान दूसरों के हवाले करके शहरों में भेजा करतीं और बहुत ज़्यादा नफा़ कमातीं, यहां तक कि कई सीरत लिखने वालों ने लिखा है कि हज़रत खदीजा तिजारत करने में बहुत माहिर थीं और मक्का में सबसे मालदार औरत थीं_

हज़रत खदीजा की उम्र उस वक्त 40 साल हो चुकी थी लेकिन अल्लाह ने शक्ल व सूरत से आपको बहुत हसीन बनाया था इसलिए मक्का के बहुत से शरीफ और मालदार नौजवान लड़के बीबी खदीजा से शादी करना चाहते थें और उन्हें इन नौजवानों की तरफ से निकाह के कई पैगाम भी आ चुके थें, लेकिन बीबी खदीजा के दिल पर अपने दोनो शौहरों की वफात का ऐसा सदमा लगा था कि उन्होंने फैसला कर लिया कि अब मैं सारी ज़िन्दगी शादी नहीं करूंगी_

लेकिन हज़रत खदीजा ने जब हुज़ूर (ﷺ) के अंदर ऐसी अजीब व गरीब चीज़ें देखीं कि आप (ﷺ) की खिदमत के लिए फरिश्ते भी आगे- पीछे लगे रहते हैं, तो बीबी खदीजा के अंदर हुज़ूर (ﷺ) की मोहब्बत बैठ गई और वो अगले दिन अपने चचा के लड़के ” वरका बिन नौफल ” के पास पहुंचीं_ हज़रत वरका उस वक्त बहुत बूढ़े हो चुके थें और अपने मज़हब से ईसाई थें, उन्होंने बहुत सी पुरानी किताबें पढ़ रखी थीं और मज़हबी चीज़ों के बारे में अच्छी मालूमात रखते थें_

इसलिए जब हज़रत खदीजा अपने चाचा के लड़के ” वरका बिन नौफल ” के पास पहुंचीं और उन्हें हुज़ूर (ﷺ) के बारे में सबकुछ बताया तो वो भी हैरानी से कहने लगें कि ” ऐ खदीजा ! मैंने पुरानी किताबों में पढ़ रखा है कि आखिरी नबी का ज़माना करीब आ चुका है और यहूद व ईसाई उस नबी का दिन-रात इंतज़ार कर रहे हैं, तो ऐ खदीजा ! अगर मोहम्मद के अंदर वो सारी बातें मौजूद हैं जो तुमने अभी मुझे बताई हैं तो मैं यकीन से कह सकता हूं कि मोहम्मद इस उम्मत के नबी हैं_

अपने चचा के लड़के ” वरका बिन नौफल ” की ज़ुबानी हुज़ूर (ﷺ) की ऐसी तारीफ सुनकर हज़रत खदीजा के दिल में हुज़ूर (ﷺ) की मोहब्बत और ज़्यादा बढ़ गई और उन्होंने फैसला कर लिया कि अब कुछ भी हो मैं मोहम्मद से निकाह का पैगाम ज़रूर भेजूंगी और फिर शाम होते- होते हज़रत खदीजा ने अपने चाचा ” अम्र बिन असद ” को घर बुलाया_ ( निकाह की बात करने के लिए हज़रत खदीजा ने अपने चचा को इसलिए घर बुलाया क्योंकि उस वक्त तक हज़रत खदीजा के वालिद ” खुवैलिद ” की वफात हो चुकी थी_

हज़रत खदीजा के चचा ” अम्र बिन असद ” जब शाम के वक्त घर पहुंचें तो बीबी खदीजा ने उनके सामने अपने दिल की बात रखी और कहा कि ऐ चचा जान ! मैं हाशमी खानदान में रहने वाले अब्दुल्लाह के लड़के ” मुहम्मद ” से निकाह करना चाहती हूं, इसलिए आप इस बारे में उनके घर वालों से बात करें_

ये सुनकर हज़रत खदीजा के चचा अम्र ने कहा कि ठीक है मैं इस सिलसिले में अबू तालिब से जाकर बात करूंगा, लेकिन उसी दिन शाम को हज़रत खदीजा ने अपनी एक सहेली ” हज़रत नफीसा ” को हुज़ूर (ﷺ) के पास भेजा और उनसे कहा कि मोहम्मद से जाकर तुम ये बातें पूछना_

हज़रत नफीसा हुज़ूर (ﷺ) के पास पहुंचीं तो कहने लगीं कि ऐ मोहम्मद ! अगर तुम्हें कोई नेक व मालदार औरत निकाह का पैगाम भेजें तो क्या आप क़बूल करेंगे ? ये सुनकर हुज़ूर (ﷺ) ने पूछा कि वो औरत कौन हैं ? तो हज़रत नफीसा ने जवाब दिया कि ऐ मोहम्मद ! वो औरत ” बीबी खदीजा ” हैं, इसलिए अगर आपकी मर्ज़ी हो तो इस सिलसिले में आपके चचा अबू तालिब से बात की जाए? तो हुज़ूर (ﷺ) ने फरमाया कि हां मैं तैयार हूं। क्योंकि हज़रत खदीजा भी वो औरत थीं कि जिनकी तारीफें दूर-दूर फैली हुई थीं_

हज़रत नफीसा ने जब ये बात आकर हज़रत खदीजा को बताई तो वो बहुत खुश हुईं और अगले ही दिन हज़रत खदीजा के चचा अम्र ने आकर हुज़ूर (ﷺ) के चचा अबू तालिब से बात की और दोनों के निकाह की तारीख मुतअय्यन हो गई_ जिस दिन निकाह होना था तो उस दिन हुज़ूर (ﷺ) अपने चचा अबू तालिब और दूसरे खानदान के कुछ लोगों के साथ हज़रत खदीजा के घर पहुंचें_

हुज़ूर (ﷺ) के चाचा अबू तालिब ने हज़रत खदीजा से हुज़ूर (ﷺ) का निकाह पढ़ा दिया और फिर हज़रत खदीजा रुखसत होकर हुज़ूर के घर आ गई_ हज़रत खदीजा ने हुज़ूर (ﷺ) का मुसीबतों के वक्त ऐसा साथ दिया कि शायद दुनिया की कोई भी बीवी उसकी नज़ीर ना पेश कर सके, क्योंकि हज़रत खदीजा का निकाह हुज़ूर (ﷺ) के साथ जा़हिरी तौर पर तो एक इत्तेफाक नज़र आता है, लेकिन हकीकत में ये निकाह अल्लाह के फैसले से हुआ, अल्लाह ने हज़रत खदीजा को हुज़ूर (ﷺ) के लिए ऐसा तैयार फरमाया कि उन्होंने मुसीबतों के वक्त हुज़ूर (ﷺ) का हर तरह साथ दिया कि जिसे बाद में याद कर करके अक्सर हुज़ूर (ﷺ) रोया करते थें, क्योंकि हज़रत खदीजा की कुछ ही दिनों बाद वफात हो गई थी और हुज़ूर मक्का से मदीना चले गएं थें_

( जारी है)



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