हुज़ूर (स.अ.) के वालिद की वफात {part- 2}| Father of prophet muhammad

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Father of prophet muhammad

Father of prophet muhammad : हुज़ूर (स.अ.) के वालिद हज़रत अब्दुल्ला को अल्लाह ताला ने बहुत ज़्यादा खूबसूरती अता की थी, जो भी उन्हें देखता अपने दांतो तले उंगलियां दबा लेता था, इसीलिए मक्का वाले भी आपसे बहुत मोहब्बत करते थें क्योंकि हज़रत अब्दुल्ला अपने चेहरे की खूबसूरती के साथ-साथ दिल के भी बहुत अच्छे इंसान थें, गरीबों की मदद करना_ यतीमो के लिए सहारा बनना और बेवा औरतों के लिए दौड़ दौड़ कर काम करना यह उनकी जिंदगी के खास अमल थें…

हज़रत अब्दुल्ला के चेहरे पर एक नूर चमकता था जो इस बात का इशारा था कि यह एक ऐसे नबी के बाप हैं जो सारी दुनिया से गुमराही को खत्म करेगा, एक दिन हज़रत अब्दुल्ला बाजार से गुज़र रहे थें कि एक बहुत मशहूर जादूगर औरत ने हज़रत अब्दुल्ला को अपने पास बुलाया, वो जादूगर औरत बहुत ज़्यादा खूबसूरत थी और अपने इल्म व हुनर की वजह से लोगों में मशहूर भी बहुत थी, उसने हज़रत अब्दुल्ला से कहा कि ऐ अब्दुल्लाह ! तुम्हारे बाप ने ज़मज़म का कुआं खोदते हुए नज़र मानी थी कि एक लड़के को ज़बह करेंगे फिर तुम्हारा नाम आ गया लेकिन तुम्हारी जगह सौ ऊंटों को ज़बह किया गया आज मैं तुम्हें सौं ऊंट इस बात के बदले में दूंगी कि तुम मेरे साथ एक रात गुजा़र लो…

हज़रत अब्दुल्ला ने कहा_ अरे नहीं नहीं, यह गुनाह की बात है मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकता, मुझे मरना गवारा है लेकिन यह गंदा काम करना मैं कभी गवारा नहीं कर सकता_ और फिर हज़रत अब्दुल्ला वहां से अपने घर को चले गएं… कुछ दिनों के बाद अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे अब्दुल्ला की शादी मदीना के एक बहुत ऊंचे खानदान की लड़की हज़रत आमिना से तय कर दी और फिर कुछ दिनों के बाद दोनों की शादी हो गई और हज़रत अब्दुल्ला बीबी आमिना को लेकर अपने घर मक्का आ गए..

उसी दिन शाम को हज़रत अब्दुल्ला को वही जादूगर औरत बाज़ार में फिर से मिली और वो कहने लगी कि ” ऐ अब्दुल्ला ! मैं कोई बदकार औरत नहीं हूं बल्कि मैं एक शरीफ घराने से ताल्लुक रखती हूं मैंने उस दिन जो तुमसे कहा था कि मेरे साथ एक रात गुजा़र लो वो सिर्फ इस वजह से कहा था कि मैंने तुम्हारे माथे पर आखिरी नबी का नूर देखा था, मैं चाहती थी कि वो नूर मेरे पेट में आ जाए और मैं उस नबी की मां बन जाऊं लेकिन तुम्हारी बीवी आमिना उसमें बाजी ले गई…

हज़रत अब्दुल्ला अपनी बीवी आमिना से बहुत ज़्यादा मोहब्बत करते थें, हज़रत आमिना भी बहुत ज़्यादा खूबसूरत थीं.. शादी के 2 महीने बाद एक रात हज़रत अब्दुल्ला ने अपनी बीवी आमिना से कहा कि ऐ आमिना ! मुझे तीन दिनों बाद मुल्क ” शाम ” की तरफ कारोबार के लिए सफर करना है ताकि कुछ पैसे कमा सकूं और अपने पैदा होने वाले बच्चे के लिए कुछ चीजों का इंतजाम कर सकूं..

हज़रत आमिना ने कहा कि आप चले जाएंगे तो मैं अकेली कैसे रहूंगी, मुझे आपके बगैर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा_ हज़रत अब्दुल्लाह कहने लगें कि ऐ आमिना ! तुम परेशान ना होना, मैं बहुत जल्दी वापस आ जाऊंगा और तुम्हारे लिए खूब अच्छे-अच्छे तोहफे लेकर आऊंगा…

और फिर तीन दिनों के बाद हज़रत अब्दुल्ला ने अपना सफर का सामान तैयार किया और ऊंट पर बैठकर मुल्क ” शाम ” की तरफ चल दिए, जब वो घर से निकल रहे थें तो हज़रत आमिना दरवाज़े के पास खड़ी अपने शौहर को उम्मीद की नज़रों से देख रही थीं और आंखों ही आंखों में उनसे कह रही थीं कि जल्दी आना मुझे आपके बगैर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा_ हज़रत अब्दुल्ला का ऊंट चलता जा रहा था और हज़रत आमिना दरवाज़े पर खड़ी अपनी मुहब्बत को दूर जाता देख रही थीं..

हज़रत अब्दुल्लाह दस लोगों के काफ़िले के साथ मुल्क ” शाम ” की तरफ रवाना हुए_ रास्ते में उनकी तबीयत खराब हो गई और मदीना ही में अपनी नानी के घर रुक गएं.. वक्त गुज़रता गया, हज़रत आमिना हर रोज़ अपने शौहर का इंतजार करती और हर आने-जाने से उनकी खबर मालूम करतीं कि मेरे शौहर अब्दुल्लाह कब आएंगे ? लेकिन उनको कोई सही जवाब ना मिलता..

जब भी मक्का में कोई काफिला तिजारत करके वापस लौटता तो हज़रत आमिना घर के दरवाज़े पर कान लगाकर खड़ी हो जाती है कि शायद मेरे शौहर अब्दुल्ला आ गए हैं लेकिन बाद में खबर मिलती है कि अब्दुल्ला इस काफ़िले में नहीं है..

दो महीनों के बाद उन दस लोगों का काफ़िला मक्का वापस लौटा जिनके साथ हज़रत अब्दुल्लाह गए थें, उनके मक्का पहुंचने की खबर एक दिन पहले ही मशहूर हो गई, यह सुनकर हज़रत आमिना बहुत खुश हुई कि मेरे शौहर वापस आ रहे हैं_ अब्दुल मुत्तलिब भी बहुत ज़्यादा खुश हुए और लोगों से पल-पल की खबर लेते कि वह काफिला अभी कहां पहुंचा है, क्या कर रहा है, कितने दिनों में आएगा..?

जिस दिन यह काफिला मक्का पहुंचने वाला था उस रात हज़रत आमिना ने खूब अच्छे कपड़े पहनें और बहुत अच्छी तरह तैयार होकर घर में बैठ गईं_ हुज़ूर (स.अ.) उस वक्त अपनी मां की पेट में 4 महीने के हो चुके थें_ आखिर वो सुबह भी आई जब ये दस लोगों का काफ़िला मक्का पहुंचा, हज़रत आमिना दरवाज़े से कान लगाकर खड़ी हो गई कि अभी मेरे शौहर आएंगे और मैं उनसे गले मिलकर खूब खुश होऊंगी…

Grave of prophet muhammad father

अब्दुल मुत्तलिब को भी जैसे ही खबर हुई तो दौड़ते हुए काफ़िले के पास पहुंचें लेकिन हज़रत अब्दुल्ला नज़र नहीं आ रही थें_ परेशान होकर काफ़िले वालों से पूछा कि मेरा लड़का अब्दुल्लाह कहां है वो नजर नहीं आ रहा है..? काफिले वालों ने जवाब दिया कि जाते वक्त मदीना के पास रास्ते ही में अब्दुल्ला की तबीयत खराब हो गई थी इसलिए वो मदीना ही में अपनी नानी के घर रुक गए थें उसके बाद हमें नहीं पता.. यह सुनते ही हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बड़े बेटे ” हारिस ” को कहा है कि ऐ हारिस ! जल्दी से अपना घोड़ा निकालो और मदीना की तरफ सफर करो और जाकर देखो कि मेरे बेटे अब्दुल्ला की क्या हालत है और फिर जल्दी से आकर मुझे खबर दो….

हज़रत आमिना का दिल आज फिर से टूट गया, वो उम्मीद बांधे बैठी थीं कि आज मेरे शौहर आएंगे लेकिन खबर तो कुछ और पहुंची_ इधर हज़रत हारिस ने बहुत तेजी से अपना घोड़ा मदीना की तरफ दौड़ाया, तीन दिनों के सफर के बाद वो मदीना पहुंचे और नानी के घर जाकर मालूम किया कि अब्दुल्ला कहां है..? तो एक दिल को दहला देने वाली ख़बर उनके कानों में पड़ी, घरवालों ने बताया कि ऐ हारिस ! अब्दुल्ला की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब थी उन्हें दिल का दौरा पड़ा था और उनकी अभी एक महीना पहले वफात हो चुकी है हमने उन्हें नाबिग़ा नाम की जगह पर दफन कर दिया है..

ये सुनकर हज़रत हारिस की भी आंखों से आंसू आ गए क्योंकि वह भी अपने छोटे भाई अब्दुल्ला से बहुत मोहब्बत करते थें और फिर यह वापस मदीना पहुंचे और अपने बाप अब्दुल मुत्तलिब को खबर दी तो हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के होश उड़ गए, अचानक उनकी आंखों से आंसू बहने लगें और अपने बेटे अब्दुल्ला की वफात का गम बर्दाश्त न कर सके लेकिन फौरन खुद को संभाला और सारे लोगों को जमा करके कहा कि ऐ लोगों ! आमिना को इसकी खबर ना होने देना क्योंकि उसके पेट में अब्दुल्लाह का बच्चा है, मैं चाहता हूं कि मेरे अब्दुल्ला की नस्ल आगे चली, वो बेऔलाद ना रहे उसके घर भी एक लड़का हो जो मेरे अब्दुल्लाह का वारिस बने…

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने ‘ शिफा ‘ नामी एक दाई को बुलाया और कहा ऐ शिफा ! तुम आमिना को बहुत समझा बुझाकर और बहुत तसल्ली देकर यह खबर सुनाना कि उनके शौहर की वफात हो गई है, लेकिन ध्यान रखना कि उनके ऊपर ज्यादा बड़ा सदमा न लगने पाए क्योंकि उनके पेट में बच्चा है…

हज़रत आमिना घर में बैठी इंतजार कर रही थीं कि हारिस अपने छोटे भाई अब्दुल्ला को मदीने से लेकर आ चुके होंगे और मेरे शौहर अब्दुल्लाह अभी मुझसे मिलने घर आएंगे, इतनी देर में हज़रत शिफा घर पहुंचती हैं और हज़रत अमिना को अपने पास बुलाकर फरमाती हैं कि ऐ अमिना ! तुम परेशान ना होना मैं तुमको एक बात बताने आई हूं, तुम खुद को संभाल लेना अपने शौहर की खातिर और अपने इस बच्चे की खातिर जो तुम्हारे पेट में है खुद को संभाल लेना क्योंकि तुम्हें सदमा लगने से इस 4 महीने के बच्चे को नुकसान हो सकता है,

फिर हज़रत शिफा ने हज़रत अमिना को सारी बातें बता दी कि तुम्हारे शौहर अब्दुल्ला की रास्ता जाते हुए तबीयत खराब हो गई थी और फिर मदीनि ही में उनकी वफात हो गई और वहीं उनको दफन कर दिया गया.. यह सुनकर हज़रत अमिना की आंखों से आंसू बहने लगें, वो खुद को संभाल नहीं पा रही थी_ हज़रत शिफा ने उनके सर पर हाथ फेरते हुए कहा कि ऐ आमिना ! खुद को संभालो, तुम्हारे पेट में अब्दुल्लाह का बच्चा है.. हज़रत अमिना ने खुद को संभाला लेकिन उनके ऊपर इस बात का ऐसा ग़म हुआ कि फिर वो किसी से मुस्कुराकर बात नहीं करती थीं_हमेशा खामोश रहतीं…

दिन गुजरते गए, हज़रत अमिना हर पल हर घड़ी अपने शौहर अब्दुल्ला को याद करती थीं लेकिन पैदा होने वाले बच्चे की खातिर अपने दिल को संभाले रहती.. अब्दुल मुत्तलिब और उनके सारे लड़के दिन-रात यही उम्मीद लगाए रहते और अल्लाह से दुआएं करते कि ऐ अल्लाह ! मेरे अब्दुल्ला के लड़के को सही सलामत इस दुनिया में भेज देना ताकि अब्दुल्ला की नस्ल बाकी रह सके…

इसी तरह 9 महीने गुज़रे और वो दिन भी आया जब अल्लाह के रसूल (स.अ.) की पैदाइश हुई_ हज़रत अमिना के घर बच्चे की पैदाइश सुनकर अब्दुल मुत्तलिब इस कदर खुश हुएं कि दौड़े-दौड़े आए और अल्लाह के रसूल (स.अ.) को गोद में लेकर काबा में गएं और सजदा ए शुक्र अदा किया फिर हुज़ूर का नाम उन्होंने ” मोहम्मद ” रखा, लोगों ने जब यह नाम सुना तो कहने लगें कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब! ये तुमने कैसा नाम रख लिया जाए हमने तो आज तक ऐसा नाम नहीं सुना, अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ऐ लोगों ! तुम्हें क्या पता कि मेरे इस पोते की दुनिया में इतनी तारीफ की जाएगी कि आज तक उतनी तारीफ किसी की ना की गई हो..

हज़रत अब्दुल्ला के बड़े सारे बड़े भाई हुज़ूर(स.अ.) की पैदाइश पर बहुत ज्यादा खुश हुएं_ यहां तक की अबू- लहब को जैसे ही उसकी नौकरानी ने आकर‌ खुशखबरी सुनाई कि ऐ अबू- लहब! तुझे भतीजा मुबारक हो_ तो अबू- लहब इतना ज्यादा खुश हुआ कि उसने अपनी नौकरानी को कहा कि जा आज से अपने भतीजे की पैदाइश की खुशी में मैंने तुझे आजाद कर दिया..


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