दीवार खुरचने वाली चुड़ैल 😱 | Ghost Story in Hindi

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  यह उस वक्त की बात है जब मैं 9 साल की थी हमारे घर से 15 किलोमीटर दूर मेरे चाचा का एक पुराना फार्म हाउस था, जिसे मेरे दादा ने बहुत सस्ते दामों में खरीदा था, ऐसा लगता था जैसे फार्महाउस का मालिक बस उस फार्म हाउस से जान छुड़ाना चाहता था इसीलिए उसने बहुत कम कीमत पर इस फार्म हाउस को बेच दिया था..

फार्म हाउस में एक तरफ सूरजमुखी के पेड़ लगे हुए थे तो दूसरी तरफ जानवरों का बाड़ा था, चाचा खुद ही उस फार्महाउस की देखभाल करते थे, यह आबादी से दूर एक खामोश और सुकून वाली जगह थी…

चाचा का घर फार्म हाउस के बिल्कुल सामने था, गर्मियों की छुट्टी में हम सारे घर वाले चाचा के घर जाया करते थे, लेकिन आज तक हम लोग कभी उस फार्म हाउस के अंदर नहीं गए थे.. इस बार मैंने सोच रखा था कि जब मैं चाचा के घर जाऊंगी तो उस फार्म हाउस में जरुर जाऊंगी..

कुछ दिनों के बाद जब हम लोग चाचा के घर गए तो मैंने चाचा जी से कहा कि मैं फार्महाउस देखना चाहती हूंँ आप मुझे ले चलो ना.. लेकिन चाचा जी ने बहाना बना दिया कि वहांँ जाना सही नहीं है और तुम भी ख्याल रखना वहां अकेले मत जाना, शायद चाचा जी उस फार्म हाउस की हकीकत जानते थी इसीलिए मुझसे मना कर दिया…

लेकिन एक दिन दोपहर को मुझे फार्महाउस में अंदर जाने का मौका मिल ही गया, शायद यह मेरी जिंदगी की सबसे भयानक गलती थी, फार्महाउस का दरवाजा खुला था मैंने इधर उधर देखा वहां कोई नहीं था मैं चुपके से फार्महाउस की तरफ चल दी, और मेन गेट से फॉर्म हाउस में अंदर दाखिल हो गई, यह बहुत ही खूबसूरत फार्महाउस था, मैं सूरजमुखी के पेड़ों के बीच में हंसती खेलती दौड़ रही थी, सामने एक बड़ा सा कमरा बना हुआ था उसमें जानवरों का चारा रखा जाता था..

मैं उस कमरे के पास पहुंची और अंदर दाखिल हो गई वह बहुत बड़ा कमरा था उसमें एक तरफ बहुत सा भूसा पढ़ा हुआ था जो ऊपर छत को छू रहा था, कमरे में अंदर जाते ही मुझे अजीब सा डर लगने लगा, मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मुझे कोई देख रहा है लेकिन वहांँ तो कोई नहीं था हर तरफ खामोशी ही खामोशी थी, मैं उस कमरे में टहलने लगी थोड़ी देर के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे कोई जानवर अपने नाखूनों से लकड़ी को खुरच रहा है..

मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो डर के मारे मेरे होश उड़ गए, कोई था जो दीवार के एक कोने में सिकुड़ा सिमटा दीवार की तरफ मुंह किये अपने दोनों हाथों से दीवार को खुरच रहा था, इसी वजह से एक डरावनी आवाज कमरे में गूंज रही थी, उसका जिस्म इंसानों की तरह था मगर उस पर गोश्त का कोई टुकड़ा नहीं था, पीली पीली मुर्दा खाल जैसे किसी ढांचे पर लपेट दी गई हो, वह बहुत भयानक दिख रहा था…

उसने अपना चेहरा मेरी तरफ मोड़ा तो डर के मारे मेरा दिल ऐसे धड़कने लगा जैसे पसलियां तोड़ कर दिल बाहर आ जाएगा, उस चीज की शक्ल ऐसी थी जैसे किसी इंसान की लाश के चेहरे को हथौड़े से पीटा गया हो..

मैं डर के मारे तेजी से दरवाजे की तरफ भागी, मुझे अपने पीछे से किसी के हांफने जैसी आवाज आ रही थी जो कि मेरे से करीब होती जा रही थी, इसका साफ मतलब था कि वह जो कुछ भी था मेरा पीछा कर रहा था..

मैं तेजी से दौड़ते हुए सूरजमुखी के खेत में आ चुकी थी मुझे अभी भी अपने पीछे से गुर्राने की आवाज सुनाई दे रही थी, मैं फार्महाउस के मेन गेट की तरफ भागी जा रही थी अचानक मुझे किसी चीज से ठोकर लगी और मैं नीचे गिर पड़ी, और कुछ ही सेकंड में वो डरावनी शक्ल बिल्कुल मेरे सामने खड़ी थी, मैंने डर की वजह से अपनी आंखें बंद कर ली वह गुर्राने की आवाज और ठंडी सांसे मुझे अपनी गर्दन के पास महसूस हो रही थी, मुझे यकीन हो चुका था कि ये मेरी जिंदगी का आखरी दिन है, तभी मुझे किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनाई दी और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे ऊपर से किसी कुत्ते ने भौंकते हुए छलांग लगाई है..

ये मेरे चाचा ही का कुत्ता “शेरु” था, वह ना जाने किस वक्त फार्म हाउस में आ गया था उसने जब मुझे उस डरावनी चीज के शिकंजे में देखा तो उसने उस पर छलांग लगाकर मेरी जान बचाई, मैं हिम्मत कर के उठी और तेजी से दरवाजे की तरफ भागी, मैं गेट पर पहुंची ही थी कि गेट खुद-ब-खुद खुल गया, मेरे चाचा और पापा फॉर्म के अंदर दाखिल हुए जो शायद मुझे गायब देखकर और कुत्ते की आवाज सुनकर फॉर्म की तरफ भागे हुए आए थे..

मैं बहुत ज्यादा डर गई थी, पापा ने मुझे गोद में उठा लिया और जल्दी से चाचू के घर ले गए, बहुत देर के बाद मेरी हालत कुछ सही हुई, पापा ने मुझसे पूछा बेटी फार्म हाउस में क्या हुआ था..? मैं थोड़ी देर खामोश रही, और फिर हिम्मत करके बोलना शुरू किया, मैंने वो सारी बातें घरवालों को बता दी कि कैसे उस अनजान चीज ने मुझ पर हमला किया था, और वह कैसा दिखता था और फिर “शेरू” ने मुझे कैसे बचाया…

इससे पहले कि मैं कुछ बोलती चाचा ने मेरी बात काटते हुए कहा : अरे बेटी वह लकड़बग्घा होगा, इस इलाके में लकड़बग्घे बहुत नजर आते हैं घबराने की कोई बात नहीं है लकड़बग्घे की हमले से इस इलाके में किसी की मौत नहीं हुई है..

मैं जानती थी कि वह लकड़बग्घा नहीं था बल्कि एक डरावनी आत्मा थी, मगर चाचू की इस बात की वजह से मैं खामोश हो गई, और हम लोग उसी दिन शाम को घर वापस होने के लिए निकल पड़े..

कई हफ्ते गुजर गए, मैं इस बात को भूल भी चुकी थी,

1 महीने के बाद फिर से सबका चाचा के यहांँ जाने का प्लान बना, थोड़ी देर के लिए तो मैं फार्महाउस वाले हादसे को याद करके डर गई थी फिर मैंने सोचा कि मैं फार्म हाउस की तरफ देखूंगी भी नहीं जाना तो दूर की बात है..

शाम को हम लोग चाचू के घर की तरफ रवाना हो गए, मैं चाचा के घर में सब से मिलने के बाद किचन में चली गई जहांँ चाची कुछ पका रही थी, उन्होंने मुझे प्यार से गले लगाया और हालचाल पूछे और फिर कहा : बेटा ! जाओ ऊपर स्टोर रूम से थोड़ी सी चीनी इस डिब्बे में भर लाओ..

स्टोर रूम दूसरी मंजिल पर गैलरी में सबसे आखिर में बना हुआ था, गैलरी में कुछ बहुत अंधेरा था, मैंने स्टोर रूम का दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हो गई, चीनी से भरी पेटी मेरे सामने ही पड़ी थी मैं उसे खोलकर डिब्बे में चीनी भरने लगी.. उसी वक्त मुझे कमरे में ऐसी आवाज सुनाई दी जैसे कोई अपने नाखूनों से लकड़ी को खुरच रहा हो, मेरी नजरें खुद-ब-खुद कमरे में दौड़ गई…

कमरे के कोने में वही डरावनी आत्मा बैठी सामने दीवार को खुरच रही थी, मेरे हाथ से चीनी का डिब्बा छूट कर जमीन पर जा गिरा, मैंने चिल्लाने की कोशिश की लेकिन मेरी आवाज ना निकली, ऐसा लग रहा था जैसे मेरे जिस्म में जान ही नहीं बची है, मैंने दरवाजे की तरफ बढ़ना चाहा तो मुझे लगा जैसे मेरे पैर अपनी जगह पर जाम हो गए हों..

तभी मैंने उसे अपनी तरफ आते देखा, मैंने अपने पूरे जिस्म की ताकत लगाकर खुद को दरवाजे की तरफ धकेला, मैं दरवाजे से टकराई, दरवाजा खुद ही खुल गया और मैं जमीन पर ऐसे गिर गई कि मेरा आधा जिस्म कमरे में था और आधा बाहर गैलरी में.. तभी मुझे बाहर से किसी ने बाजू से पकड़ कर अपनी तरफ उठाया, मेरी हलक़ से चीख निकल गई.. ” बेटा ! घबराओ नहीं, ये मैं हूंँ..” मेरे कान में चाचा की आवाज पड़ी तो मेरी जान में जान आई..

चाचा ना जाने कब ऊपर आए थे, चाचू की नजरें स्टोर के अंदर देख रही थी, उनके चेहरे पर डर नजर आ रहा था उन्होंने मुझसे कहा : बेटा ! मेरे साथ आओ, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है… चाचा ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे घर के बाहर सहन की तरफ लेकर आ गए…

बेटा ! मुझे मालूम है कि तुम अभी बहुत छोटी हो, लेकिन जो कुछ मैं तुम्हें बताने जा रहा हूं उसे गौर से सुनना, अब मामला तुम्हारी जिंदगी का है… आज से 50 साल पहले की बात है जब तुम्हारे दादा ने एक अजनबी आदमी से यह फार्म हाउस खरीदा था, उस आदमी ने ये फार्म हाउस बहुत कम कीमत पर बेच दिया था, इसकी वजह भी हमको कई सालों के बाद समझ में आई थी..

मेरी उम्र उस वक्त 17 साल थी मैं तुम्हारे दादा के साथ इस फार्म हाउस में काम किया करता था, इस फार्महाउस में कुछ अजीब सा महसूस हुआ करता था जैसे कोई मुझे देख रहा है, इसी तरह कभी-कभी मुझे फॉर्म हाउस में किसी कोने से लकड़ी के खुरचने की आवाज सुनाई देती थी.. शुरू शुरू में मैं इसे चूहों की आवाज समझता था लेकिन गुजरते दिनों के साथ इन आवाजों में भी तेजी पैदा होने लगी थी..

मुझे इस आवाज से बहुत नफरत हो गई थी क्योंकि इसकी वजह से मुझे काम में खलल आता था, मैंने अपने बाबा से इस बारे में बताया भी लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं है..

एक दिन मैं फार्म हाउस की एक पुरानी लकड़ी की दीवार तोड़ रहा था, अचानक मुझे उसके पीछे इंसानी हड्डियों का एक ढांचा मिला.. फौरन पुलिस को बुलाया गया, पोस्टमार्टम के बाद मालूम हुआ कि ये एक औरत की लाश है जिसको आज से 50 साल पहले मारा गया था, तहकीक करने पर मालूम हुआ कि उस औरत को उसी लकड़ी की दीवार में कीलो से ठोक दिया गया था और इस फार्महाउस को बाहर से बंद कर दिया गया था वह औरत अंदर ही तड़प तड़प के मर गई थी..

उस दिन के बाद से मेरे ऊपर मानो एक मुसीबत सी आ गई हो, मैं रोजाना उसी औरत की लाश को फार्म हाउस के किसी ना किसी कमरे में दीवार खुरचते देखता था, वह बहुत खतरनाक आत्मा थी जो नफरत की आग में जल नहीं थी..

लेकिन मैंने और बाबा ने उस आत्मा से बचने का एक तरीका निकाल लिया था, वो ये था कि उस आत्मा के ऊपर ध्यान ही ना दिया जाए, क्योंकि वो आत्मा किसी भी इंसान पर उसी वक्त हमला करती है जब कोई उसकी तरफ ध्यान देता है, उसकी तरफ देखता है या उसके ऊपर हमला करने की कोशिश करता है…

उसके बाद से जब भी मुझे फार्म हाउस में लकड़ी खुरचने की आवाज सुनाई देती, या उस आत्मा की झलक नजर आती तो मैं उस पर ध्यान ही नहीं देता था, वहांँ से हटकर अपने काम में मगन हो जाता, इस तरह दोबारा कभी मुझ पर कोई हमला नहीं हुआ.. वो आत्मा लकड़ी इसलिए खुरचती है क्योंकि उसकी मौत भी लकड़ी खुरचते खुरचते हुई थी…

अब उस आत्मा की नजर तुम पर पड़ चुकी है, इसलिए वो आसानी से तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगी, शायद वो तुम्हारे घर और तुम्हारे स्कूल तक तुम्हारा पीछा करे, लेकिन तुम डरना नहीं, अगर तुमने भी उस पर ध्यान ना देने वाली आदत अपना ली तो वो तुम्हारा पीछा छोड़ देंगी…

मैं खामोशी से चाचू की बातें सुन रही थी, उसी शाम हम लोग घर वापस आ गए, उस रात जल्दी-जल्दी मैंने अपना होमवर्क किया और सोने के लिए लेट गई, अभी मैंने कंबल ओढ़ा ही था कि मुझे ऐसी आवाजें सुनाई दी कि जैसे कोई मेरे बेडरूम के दरवाजे को बाहर से खुरच रहा है…

मुझे चाचू की बात याद आ गई और मैंने उस आवाज पर जरा भी ध्यान नहीं दिया, अपना कंबल लपेट कर मैं सोने की कोशिश करने लगी, बहुत देर तक वो डरावनी आवाजे आती रहीं, थोड़ी देर के बाद मुझे नींद आ गई..

सपने में मैंने देखा कि मैं चट्टानों से भरी अर्ध-अंधेरी घाटी में नंगे पैर दौड़ रही हूँ, और वही खूनी आत्मा मेरा पीछा कर रही है, मेरे पैर नुकीले पत्थरों की वजह से जख्मी हो गए हैं और उनसे खून बह रहा है जिससे पैरों के निशान जमीन पर बन रहे हैं…

अचानक मुझे एक पत्थर से ठोकर लगती है और मैं मुँह के बल गिर जाती हूँ, फिर वो खूनी आत्मा मेरे सिर तक पहुँच जाती है और अपने तीखे पंजों से मेरे शरीर के हर हिस्से को आधा काट देती है..

ये सपना देखकर मेरी आँखें डर से खुल गई, मैं पसीने में भीग गई थी, मेरा शरीर बुरी तरह काँप रहा था..

उसके बाद से ये मेरी आदत बन गई थी कि घर, स्कूल, कार हर जगह मुझे वो लकड़ी खुरचने की आवाज सुनाई देती थी और कभी-कभी उसकी एक झलक भी दिख जाती थी, लेकिन मैं हर बार अपने दिल को मजबूर करके उसे अनदेखा कर देती थी..

इसी तरह कुछ दिन गुजर गए और मुझे वो मनहूस शक्ल दिखना बंद हो गई, आज इस बात को 12 साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी मैं अपना वो डर नहीं भूल पाई हूंँ…

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