बीबी खदीजा ने फरिश्ते ” जिब्रील ” को देखकर सर का दुपट्टा क्यों हटाया_? | Hazrat Khadija aur Jibril

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जब हुज़ूर (ﷺ) की उम्र 40 साल हुई, तो अचानक आपके साथ कुछ अजीबोगरीब चीज़ें होने लगीं, वो इस तरह कि जब भी आप बाहर घूमने जातें तो रास्ते के हर पेड़ व पत्थर आपको सलाम करतें, अचानक आवाज़ आने लगती कि ” ऐ मुहम्मद ! अस्सलामु अलैकुम “_ ये सुनकर हुज़ूर (ﷺ) परेशान हो जातें कि आखिर ये आवाज़ें किधर से आ रही हैं? यहां तो हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा है, कोई नज़र ना आता, लेकिन वो आवाज़ें बराबर आती रहतीं_

इसी तरह उस ज़माने में हुज़ूर (ﷺ) जो भी ख्वाब देखतें वो बिल्कुल सच साबित होता, अगर ख्वाब में देखतें कि मैं फलां इंसान से बात कर रहा हूं, या काबे के पास खड़ा नमाज़ पढ़ रहा हूं, या दूर से कोई इंसान मुझसे मिलने आ रहा है, तो अगले दिन वो सभी बातें बिल्कुल सच होकर नज़र आतीं, ये सब देख आप (ﷺ) बहुत परेशान थें कि आखिर ये मेरे साथ क्या हो रहा है_?

वक्त गुज़रता गया और हुज़ूर (ﷺ) को अकेले रहना ज़्यादा पसंद आने लगा, किसी से भी बात ना करतें, अक्सर खामोश रहतें, उन दिनों में अक्सर हुज़ूर (ﷺ) मक्का से थोड़ी दूर एक पहाड़ पर बनी ग़ार में चले जातें और कई कई दिन वहीं गुजा़रतें_

आप (ﷺ) कई दिनों का खाना लेकर उस ग़ार में जातें और वहां बैठकर सोचा करतें कि आखिर इस दुनिया को किसने बनाया ? ये कायनात का सारा निज़ाम कैसे चल रहा ?

एक दिन दोपहर के वक्त हुज़ूर (ﷺ) उस ग़ार में बैठे सोच रहें थें कि तभी अचानक आसमान की तरफ से एक बड़ी अजीब सी चीज़ नीचे को उतरती नज़र आई, वो चीज़ बहुत तेज़ी से उड़ते हुए ग़ार के पास खड़ी हो गई_

वो हज़रत जिब्रील (अ) थें जो कि आप (ﷺ) के पास पहली ” वही ” लेकर आए थें, लेकिन हज़रत जिब्रील (अ) को इसतरह आता देख आप (ﷺ) बहुत डर गएं और कांपने लगें_ हज़रत जिब्रील ने ग़ार के पास आकर कहा कि ऐ मुहम्मद ! बाहर निकलो_

हुज़ूर (ﷺ) को नहीं पता था कि ये मेरे सामने अल्लाह के मुक़र्रब फरिश्तें हज़रत जिब्रील (अ) खड़े हैं, जो कि नबियों के पास ” वही ” लेकर आते थें, हुज़ूर (ﷺ) ने तो जब पहली बार हज़रत जिब्रील को देखा तो बहुत ज़्यादा डर गएं, और आपका जिस्म कांपने लगा_

हुज़ूर (ﷺ) जैसे ही ग़ार से बाहर निकलें, तो हज़रत जिब्रील ने पीछे से आपको पकड़ लिया और गर्दन के बीच अपनी कोहनी रखकर बहुत तेज़ दबाया और कहने लगें कि ऐ मुहम्मद ! पढ़ो…

ये सुनकर हुज़ूर (ﷺ) बहुत घबरा गएं, और डरते हुए कहने लगें कि मैं पढ़ना नहीं जानता, लेकिन हज़रत जिब्रील ने अगली बार और तेज़ गर्दन दबाई और कहा कि ऐ मुहम्मद ! पढ़ो… तो हुज़ूर (ﷺ) ने दूसरी बार भी वही जवाब दिया कि मुझे पढ़ना नहीं आता, मैं उम्मी हूं_

जब अल्लाह के रसूल ने इस बार भी वही जवाब दिया तो हज़रत जिब्रील में तीसरी बार हुज़ूर (ﷺ) को इतनी तेज़ दबाया कि अल्लाह के रसूल फरमाते हैं कि मुझे उस वक्त महसूस हुआ कि जैसे मेरी जान निकल जाएगी, और फिर हज़रत जिब्रील ने कहा कि ऐ मुहम्मद ! पढ़ो_

जब हज़रत जिब्रील ने तीसरी बार हुज़ूर (ﷺ) को दबाया तो उसी वक्त अल्लाह की तरफ से एक तजल्ली हुज़ूर (ﷺ) की तरफ आई और आपके जिस्म में शामिल हो गई, वो तजल्ली से एक ऐसी ताकत थी कि जिसकी वजह से हुज़ूर (ﷺ) ” वही ” के बोझ को बर्दाश्त कर लेतें, वरना कुरान में अल्लाह ने फ़रमाया है कि अगर इस कुरान को हम पहाड़ पर भी नाज़िल कर देतें, तो शायद पहाड़ भी इसे बर्दाश्त न कर पाता और रेज़ा रेज़ा होकर खत्म हो जाता, लेकिन अल्लाह ने हुज़ूर (ﷺ) का दिल ऐसा मज़बूत बना दिया था कि आप (ﷺ) आराम इस ” कुरानी वही ” के बोझ को बर्दाश्त कर लेतें_

इसीलिए जब हज़रत जिब्रील (अ) ने तीसरी बार हुज़ूर (ﷺ) को दबाया और अल्लाह की तजल्ली आपके दिल में शामिल हो गई तो अल्लाह के रसूल ने पढ़ना शुरू कर दिया, और फिर हज़रत जिब्रील ने सूरह ” इकरा बिस्मी ” की पांच आयतें पढ़कर सुनाई कि जिनका मतलब है कि ऐ मुहम्मद ! पढ़ो उस अल्लाह के नाम से कि जिसने सारी कायनात को बनाया और इस इंसान को खनखनाती मिट्टी से पैदा किया, ऐ मुहम्मद ! पढ़ो आपका रब बहुत मेहरबान है, कि जिसने कलम के ज़रिए इंसान को इल्म सिखाया और उसे वो बातें बताईं कि जो वो कभी नहीं जानता था_

हज़रत जिब्रील ने हुज़ूर (ﷺ) को कुरान की वो आयतें पढ़ाई और फिर दूर हटकर खड़े हो गएं, अल्लाह के रसूल उस वक्त हज़रत जिब्रील को बहुत डरी हुई नज़रों से देख रहे थें, अचानक हज़रत जिब्रील (अ) फिर से आसमान की तरफ उड़ने लगें, ये देख हुज़ूर (ﷺ) और ज़्यादा डर गएं और जल्दी से घर की तरफ चल दिएं_

उस वक्त वहां पहाड़ पर कोई भी नहीं था, हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा था, दोपहर का वक्त था और आसमान पर सूरज चमक रहा था, एक मासूम सा इंसान इस वीरान इलाक़े में खड़ा कांप रहा था, कोई उसे सहारा देने वाला नहीं था, उस इंसान को नहीं पता था कि आखिर ये फरिश्ता कौन है और मेरे पास क्यों आया है ? लेकिन शायद अब दुनिया की तक़दीर बदलने का वक्त आ चुका था, और अल्लाह भी अपने उस प्यारे नबी से मुखातब हो रहे थें कि जिनके लिए सारी कायनात को बनाया गया, ज़मीन व आसमान, चांद व सूरज, चरिंद व परिंद, यहां तक कि हर चीज़ को उन्हीं की खातिर पैदा किया गया_

आज उस मासूम नबी को इस वीरान इलाके में सारी दुनिया को सही राह पर लाने की ज़िम्मेदारी दी जा रही थी, लोगों को बताया जा रहा था कि ऐ लोगों ! अब वो नबी आ चुका है कि जिसका दुनिया की हर चीज़ को इंतज़ार था, वो नबी आ चुका है कि जिसके एक आंसू पर आसमानों में तहलका मच जाएगा, वो नबी आ चुका है कि जिसकी दुआओं पर आसमानों के सारे फरिश्ते उसकी मदद करने आ जाएंगे_

हमारे नबी हुज़ूर (ﷺ) उस वक्त पहाड़ पर खड़ें हज़रत जिब्रील (अ) को आसमान की तरफ जाता देख रहे थें, और आपका सारा जिस्म कांप रहा था, जब हज़रत जिब्रील आंखों से गायब हो गएं तो आप (ﷺ) जल्दी से पहाड़ से नीचे उतरें और तेज़ क़दमों के साथ अपने घर की तरफ चल‌ दिएं, उस वक्त घर में आप (ﷺ) की तीन बेटियां और बीबी खदीजा थीं_

जैसे ही इन सब ने हुज़ूर (ﷺ) का चेहरा देखा तो आप इतना ज़्यादा डरे हुए थें कि जिस्म कांप रहा था, ये हालत देख हज़रत खदीजा दौड़ती हुई पास पहुंचीं और कहने लगीं कि आपको क्या हो गया है ? अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने कोई जवाब न दिया, सारी लड़कियां परेशान थीं कि पता नहीं आज मेरे वालिद को क्या हो गया है, वो इतना डरे हुए क्यों हैं ?

थोड़ी देर बाद अल्लाह के रसूल ने इशारे से कहा कि ऐ खदीजा ! मेरे लिए चादर लेकर आओ, मुझे बहुत डर लग रहा है_ बड़ी बेटी ज़ैनब दौड़कर गईं और एक चादर लेकर आईं, हुज़ूर (ﷺ) चारपाई पर लेट गएं और हज़रत खदीजा ने ऊपर से चादर डाल दी_ 

बहुत देर बाद जब हुज़ूर (ﷺ) की कुछ हालत ठीक हुई तो आप चारपाई से उठें, हज़रत खदीजा ने पंखे की हवा देते हुए पूछा कि आपको क्या हो गया था ? तो हुज़ूर (ﷺ) ने बीवी को सारी बातें बता दीं और फिर वो आयते भी पढ़कर सुनाई जो हज़रत जिब्रील ने सिखाई थीं_

इसके बाद हुज़ूर (ﷺ) कहने लगें कि ऐ खदीजा ! मुझे अपनी जान जाने का खतरा है_ !! तो ये सुनकर हज़रत खदीजा कहने लगीं कि ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता, मैं अल्लाह की कसम खाकर कहती हूं कि अल्लाह आपकी इज्ज़त को कभी दाग़दार नहीं करेगा, क्योंकि आप गरीबों का सहारा बनते हैं, भूखों को खाना खिलाते हैं, यतीमो की किफालत करते हैं और परेशान लोगों की मदद करते हैं, तो आपका अल्लाह आपको कभी ज़ाया नहीं होने देगा_

लेकिन हुज़ूर (ﷺ) की घबराहट कम नहीं हो रही थी तो हज़रत खदीजा ने कहा कि आप परेशान ना हों, चलो मेरे साथ मेरे चाचा के लड़के ” वरका बिन नौफ़ल ” के पास चलो, वो पुरानी किताबों के माहिर हैं, मुझे यकीन है कि वो आपके बारे में ज़रूर कोई अच्छा मशवरा देंगे_

(प्यारे दोस्तों ! इसके आगे का वाक़िआ इंशाअल्लाह जल्द ही अपलोड किया जाएगा कि जिसमें बताया जाएगा कि जब दूसरी बार हज़रत जिब्रील हुज़ूर (ﷺ) के पास आएं तो उन्हें देख हज़रत खदीजा ने अपने सर से दुपट्टा क्यों हटा दिया था ? और फिर अल्लाह के रसूल अपने आप को पहाड़ से नीचे गिराने की कोशिश क्यों करने लगें_)

(जारी है)


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