हुज़ूर (स.अ.) की अम्मी की वफात {part-7} | Prophet Muhammad’s Mother Amina

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हज़रत आमिना के शौहर हज़रत अब्दुल्ला की वफात को 6 साल गुज़र चुके थें, हज़रत आमिना अपने शौहर अब्दुल्ला को बहुत याद करती थीं और अक्सर रातों में उन्हें याद करके रोया करती थीं, लेकिन किस्मत का ऐसा फैसला कि 6 साल गुज़र चुके हैं और अभी तक अपने शौहर की क़बर पर भी जाने का मौक़ा ना मिल सका, आखिर बेचैन होकर एक दिन हज़रत आमिना ने मदीना जाने का इरादा बना ही लिया और अपने ससुर अब्दुल मुत्तलिब से आकर फरमाया कि..islamic story

हज़रत उम्मे ऐमन हज़रत आमिना के हाथ पैर दबा रही थीं और उनके सर पर हाथ फेरते हुए कह रही थीं कि ऐ आमिना ! हिम्मत रखो तुम्हें कुछ नहीं होगा तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी_ लेकिन हज़रत आमिना समझ चुकी थीं कि शायद अब जाने का वक्त आ चुका है_

बाबा जान ! मैं कुछ दिनों के लिए अपने घर मदीना जाना चाहती हूं आप इजाज़त दे दें, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने फरमाया कि ठीक है चली जाओ_ हज़रत आमिना ने सफर का सामान तैयार किया और अपनी नौकरानी उम्मे ऐमन और हमारे हुज़ूर (स.अ.) को लेकर एक ऊंटनी से मदीना की तरफ चल पड़ीं, उस वक्त हमारे हुज़ूर (स.अ.) की उम्र सिर्फ 6 साल थी…

मक्का से मदीना की दूरी चार सौ किलोमीटर है_ उस वक्त लोगों की आबादी बहुत कम थी रास्ते में सन्नाटा ही सन्नाटा रहता था, हर तरफ एक वीरानी और वहशत सी महसूस होती थी, लेकिन ये 3 लोगों का काफ़िला धीरे-धीरे मदीना की तरफ बढ़ता जा रहा था, इस काफ़िले में मर्दों में सिर्फ एक 6 साल का बच्चा था..

रास्ते भर हज़रत आमिना की आंखों में कभी आंसू भर आते और अब कभी दिल में एक तड़प उठती कि आज मैं अपने शौहर अब्दुल्ला की कब्र पर जा रही हूं, मैं जाकर मदीना में अपने घरवालों से पूछूंगी कि वो क्या मंज़र था जब मेरे शौहर अपनी जिंदगी की आखिरी सांसे ले रहे थे? उन्हें कैसा दर्द उठा था ? वो मुझे क्यों इस भरी जवानी में छोड़कर चले गएं मैंने तो अभी अपने शौहर के साथ एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की थी, शादी को सिर्फ दो ही महीने गुज़रे थें कि वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चले गए, आज 6 साल गुज़र चुके हैं मैं उन्हीं की यादों का सहारा बनाकर ज़िंदगी गुज़ार रही हूं..

पुरानी यादों का एक तूफान था जो हज़रत आमिना के दिल में बरपा था_ ऊंटनी मदीना की तरफ बढ़ती गई, दस दिनों का सफर करके हज़रत आमिना मदीना पहुंची_ घर पहुंचते ही हज़रत आमिना ने जैसे ही अपनी अम्मी को 6 साल के बाद देखा तो शौहर का वो ग़म जो अभी तक दिल में था उभर कर चेहरे पर आ गया और फिर हज़रत आमिना अपनी अम्मी से लिपट कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगीं_ हज़रत आमिना के आंसू ही आज सारे घर वालों को उनकी दर्द भरी दास्तान सुना रहे थें कि इस 25 साल की नौजवान लड़की आमिना ने इतनी कम उम्र में कैसे-कैसे ग़म बर्दाश्त किए हैं लेकिन ज़ुबान से एक लफ्ज़ भी ना बोला, आज जब 6 सालों के बाद अपनी मां पर नज़र पड़ी तो हज़रत आमिना अपने आप पर क़ाबू ना कर सकीं और अपनी अम्मी से लिपट कर सब कुछ कह डाला..

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हज़रत आमिना की अम्मी अपनी बेटी को दिलासा दे रही थीं और कह रही थीं कि बेटी ! परेशान ना हो अल्लाह तुझे इसका बेहतर बदला अता फरमाएगा_ हज़रत आमिना की अम्मी ने जब अपने नाती मुहम्मद को देखा तो बहुत खुश हुईं और हर एक के सामने तारीफें करते ना थकतीं कि ज़रा मेरे नाती को तो देखो, अल्लाह ने उसे कैसी खूबसूरती अता फरमाई है…islamic story

दो दिनों के बाद हज़रत आमिना अपने शौहर अब्दुल्ला की कब्र पर पहुंचीं, कब्र के पास बैठकर बहुत देर तक रोती रहीं और दिल ही दिल अपने शौहर से कुछ कह रही थीं, शायद वो कह रही होंगी कि ” ऐ अब्दुल्ला ! तुम मुझे इतनी जल्दी छोड़कर क्यों चले गए, मैंने तो तुम्हारे साथ सारी ज़िंदगी गुजा़रने के सपने देखे थें लेकिन तुमने तो मुझे ज़िंदगी के सफर में अकेला ही छोड़ दिया, मुझे तुम्हारे बगैर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है, ऐ अब्दुल्ला ! काश कि तुम ज़िंदा होते तो आज अपनी इस आमिना का ग़म देखतें, मैं तो घर में उम्मीद लगाए बैठी थी कि आप दो महीने में वापस आ जाएंगे लेकिन आप तो अभी तक वापस ना आएं_

ऐ अब्दुल्ला ! काश कि तुम ज़िंदा होते तो आज अपने इस चांद जैसे खूबसूरत बच्चे को देखतें कि अल्लाह ने तेरे बच्चे को कैसा हुस्न अता फ़रमाया है, ऐ अब्दुल्ला ! काश कि तुम ज़िंदा होतें तो अपने इस यतीम बच्चे को अपने कंधों पर बिठाकर बाजा़रों में घुमातें, उसके लिए अच्छे अच्छे खिलौने लातें, उसे अपने हाथों से खाना खिलातें_

लेकिन ऐ अब्दुल्ला ! आज ये तुम्हारा चांद सा खूबसूरत बच्चा यतीम हो गया है, उसके सर से बाप का साया उठ चुका है, तेरा ये प्यारा बच्चा अपनी ज़ुबान से तो कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके दिल में भी मुहल्ले के दूसरे बच्चों को देखकर ये ख्याल ज़रूर आता होगा कि ऐ काश मेरे अब्बा ज़िंदा होतें तो वो भी मुझे अच्छे अच्छे खिलौने लाकर देतें, मुझे बाजारों में घुमातें और मुझे प्यारे- प्यारे कपड़े पहनातें..

हज़रत आमिना अपने शौहर की कब्र के पास बैठी बराबर रोएं जा रही थीं, और फिर शाम होते होते अपनी बांदी उम्मे ऐमन के साथ घर वापस आ गई…

हज़रत आमिना ने एक महीना अपने माईके मदीना में गुज़ारा और फिर एक दिन अपनी मां से कहा कि अम्मा जान ! अब मैं घर वापस जाना चाहती हूं आप मुझे इजाज़त दें_

मां से इजाज़त लेकर हज़रत आमिना मक्का की तरफ चल पड़ीं, ऊंटनी पर सबसे आगे हमारे हुज़ूर (स.अ.) बैठे हुए थें फिर हज़रत आमिना और सबसे पीछे हज़रत उम्मे ऐमन_ ये तीन लोगों का काफिला मक्का की तरफ रवाना हुआ, हमारे हुज़ूर (स.अ.) के सारे मामू और खालाएं इन तीनों को मदीना के बाहर तक अलविदा कहने आएं और फिर ये तीन लोगों का काफ़िला मक्का की तरफ रवाना हो गया…

तीन दिनों के सफर के बाद ये काफ़िला अरब की सबसे वीरान जगह से गुज़र रहा था, उस जगह का नाम ‘ अबवा ‘ है हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा था, घनी झाड़ियां, काले सियाह पहाड़, शाम का वक्त था और इस रेगिस्तानी वीरान इलाक़े से इन तीन लोगों का क़ाफिला मक्का की तरफ चलता जा रहा था..

हज़रत आमिना जब से अपने शौहर की कब्र से वापस आई थीं तो उनके दिल पर बहुत गहरा सदमा लगा था, वो बड़ी खामोश खामोश रहती थीं, रास्ते भर वो अंदर ही अंदर आसुओं के घूंट पी रही थीं लेकिन अपने इस मासूम बच्चे के सामने कुछ भी ज़ाहिर नहीं कर रही थीं कि कहीं मेरे बच्चे को कोई तकलीफ ना हो_

‘ अबवा ‘ के मक़ाम पर पहुंच कर अचानक हज़रत आमिना के सीने में दर्द उठा और उन्होंने हज़रत उम्मे- ऐमन को फौरन बताया कि मुझे सीने में दर्द हो रहा है, हज़रत उम्मे- ऐमन ने हज़रत आमिना से कहा कि आप परेशान ना हो, मैं ऊंटनी को किसी ऊंची जगह पर रोकती हूं_ और फिर हज़रत उम्मे- ऐमन ऊंटनी को एक ऊंचे टीले पर लेकर पहुंची, उस जगह पर पत्थर का एक तख्त सा बना हुआ था, उन्होंने हज़रत आमिना को ऊंटनी से उतारकर उस पत्थर पर लिटा दिया..islamic story

हज़रत आमिना के बार-बार सीने में अजीब सा दर्द उठ रहा था, शायद उन्हें अपने शौहर का ग़म बहुत ज़्यादा हो गया था इसलिए उन्हें दिल का दौरा आ रहा था, हज़रत आमिना बार-बार अपना सीना पकड़ रही थीं और दर्द को रोकने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन क़ुदरत को कुछ और मंज़ूर था_ हमारे हुज़ूर अपनी अम्मी को घबराई हुई निगाहों से देख रहे थें, वो समझ नहीं पा रहे थें कि मेरी अम्मी को क्या हो रहा है_?

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हुज़ूर (स.अ.) की उम्र उस वक्त सिर्फ 6 साल थी, आंखों में आंसू भरे हुए थें, दिल घबरा रहा था और बार-बार हमारे हुज़ूर अपनी मम्मी से कह रहे थें कि अम्मी जान ! आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो, आप खामोश क्यों हो, मुझसे बात करो अम्मी_!

हज़रत आमिना दर्द की वजह से बार-बार अपनी आंखें बंद करतीं और खोलतीं, हज़रत आमिना आंख खोलकर अपने इस 6 साल के बच्चे को देखतीं और दिल ही दिल सोचती कि अब मेरे इस यतीम बच्चे का क्या होगा, मेरे बच्चे ने अपने बाप का साया तो देखा ही नहीं, और अब मैं भी इसे छोड़ कर जा रही हूं, ना बहन है ना भाई है, मेरा बच्चा अब किसके सहारे जिएगा_ ?

हज़रत आमिना दर्द की वजह से बार-बार अपनी आंखें बंद कर लेतीं, लेकिन हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपनी अम्मी को हिलाते और रोते हुए पूछते कि अम्मी जान ! आपको क्या हो रहा है! शायद हमारे हुज़ूर भी कुछ कुछ समझ चुके थें, लेकिन फिर भी 6 साल का बच्चा क्या जानें कि उसकी मां को क्या हो रहा है? आज तक हमारे हुज़ूर (स.अ.) ने किसी को मरते हुए नहीं देखा था..

आखिर हज़रत आमिना ने मौत से कुछ सिकंड पहले सारा ज़ोर लगाकर अपनी आंखें खोली और अपने 6 साल के बच्चे के सर पर हाथ रखते हुए कहा कि बेटा ! परेशान ना होना अब मैं जा रही हूं लेकिन सारी दुनिया को एक ऐसा बच्चा देकर जा रही हूं जो सारी कायनात को रोशन कर देगा…

इतना कहकर हज़रत आमिना ने हुज़ूर का सर अपने सीने पर रख लिया और अपनी आंखें बंद कर ली, हुज़ूर (स.अ.) ने महसूस किया कि मेरी अम्मी की कोई आवाज़ नहीं आ रही तो सर उठा कर देखा तो हज़रत आमिना की वफात हो चुकी थी, हमारे हुज़ूर अपनी अम्मी को हिला रहे थें और कह रहे थें कि अम्मी जान ! उठो मुझसे बात करो मैं आपके बगैर कहीं नहीं जाऊंगा, मेरा मक्का में आपके सिवा कौन है_?

हमारे हुज़ूर (स.अ.) रोते हुए अपनी अम्मी को उठा रहे थें और हज़रत उम्मे ऐमन बार-बार हमारे हुज़ूर को दिलासा दे रही थीं और कह रही थीं कि बेटा ! तुम्हारी अम्मी हम सब को छोड़ कर जा चुकी हैं वो अब कभी वापस नहीं आएंगी.. हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपनी अम्मी से लिपट कर रो रहे थे और उम्मे ऐमन से कह रहें थे कि खाला जान, मेरी अम्मी उठ क्यों नहीं रही, वो मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हैं, मैं अपनी अम्मी के साथ मक्का जाऊंगा, मेरा इनके अलावा कौन है_?

दोस्तों ! वो क्या डरावना मंज़र होगा कि मक्का- मदीना की आबादी से बहुत दूर एक सुनसान इलाक़े में 6 साल का बच्चा अपनी मां से लिपट कर रो रहा है और अपनी मां को मरते हुए देख रहा है, शायद उस दिन आसमान के फरिश्ते भी रो दिएं होंगे_

उस वक्त हमारे हुज़ूर (स.अ.) के पास सिर्फ हज़रत उम्मे ऐमन थीं जो कि घर की नौकरानी थीं, घर की नौकरानी से क्या दिलासा मिल सकता है_ अगर अल्लाह चाहता तो हज़रत आमिना को मदीना में वफात दे सकता था, कम से कम हमारे हुज़ूर की ख़ाला, मामू या नानी हमारे हुज़ूर को गले से लगाकर कुछ दिलासा दे देतें_ और अगर अल्लाह चाहता तो हज़रत आमिना को मक्का में वफात दे सकता था, कम से कम हमारे हुज़ूर के चाचा, दादा अब्दुल मुत्तलिब या फूफियां ही हमारे हुज़ूर को गले से लगाकर दिलासा दे देतीं और मुसीबत के इस वक्त में हमारे हुज़ूर के लिए सहारा बनतीं..

लेकिन अल्लाह ताला सारी दुनिया को दिखाना चाहते थें कि ऐ लोगों देखो ! ये मोहम्मद वो हस्ती है कि जिसकी खातिर मैंने सारी कायनात बनाया, इस बच्चे से मैं इतनी मोहब्बत करता हूं कि पूरे कुरान में मैंने उसे नाम लेकर नहीं पुकारा हमेशा मोहब्बत से पुकारा है, ऐ लोगों ! ये मोहम्मद वो बच्चा है कि जिसके इशारे पर आसमानों में तहलका मच जाता है, जिसके दुआ के हाथ उठते ही मैं दुनिया का निज़ाम ही बदल देता हूं, जिसकी उंगली के इशारे पर मैं चांद के दो टुकड़े कर देता हूं, ऐ लोगों ! ये मुहम्मद वो हस्ती है कि जिसे मैंने सारे जहान की खूबसूरती दी है, आ जाओ आज सारी दुनिया वालों ! ज़रा ‘ अबवा ‘ के मक़ाम पर आकर देख लो कि इस बच्चे पर कैसी मुसीबतों का पहाड़ टूटा है, वो कैसे अपनी मां से लिपट- लिपटकर रो हो रहा है, आज उसे कोई सहारा दने वाला नहीं…

हज़रत उम्मे ऐमन ने किसी तरह पत्थरों को हटाकर क़बर बनाई और फिर जब उसमें हज़रत आमिना को उतारने लगीं तो हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपनी मां से चिमट गएं और कहने लगें कि खाला जान ! मेरी मां को इन पत्थरों में मत रखो मुझे उन्हें घर ले जाना है_ हज़रत उम्मे ऐमन ने किसी तरह हज़रत आमिना को क़ब्र में उतारा और फिर हुज़ूर (स.अ.) को लेकर ऊंटनी की तरफ चल पड़ीं_

जब हज़रत उम्मे ऐमन ऊंटनी पर बैठने लगीं तो पीछे मुड़कर देखा तो हमारे हुज़ूर (स.अ.) मौजूद नहीं थें, वो बहुत परेशान हो गई कि हुज़ूर कहां गए_ ऊपर टीले से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी, दौड़ती हुई ऊपर गईं तो देखा कि हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपनी मां की कब्र से लिपट कर रो रहे हैं और कह रहे हैं कि ” अम्मा जान ! आप मुझे इतनी जल्दी छोड़कर क्यों चली गई, मेरा आपके सिवा कौन है, ना मेरा कोई भाई है ना बहन है अब मैं किसके सहारे ज़िंदगी गुजा़रूंगा_?

हज़रत उम्मे ऐमन ने पीछे से हुज़ूर (स.अ.) को उठाया और कहा कि बेटा ! चलो, घर चलते हैं_ हमारे हुज़ूर ने कहा कि नहीं, मैं अपनी अम्मी के साथ जाऊंगा.. हज़रत उम्मे ऐमन ने किसी तरह हुज़ूर को अपनी गोद में उठाकर ऊंटनी पर बिठाया और मक्का की तरफ चल दीं_

हज़रत उम्मे ऐमन फरमाती हैं कि जब तक आमिना की क़बर नज़र आती रही हमारे हुज़ूर बार बार अपनी अम्मी की क़बर को देखते जा रहे थें और मुझसे कह रहे थें कि खाला जान ! मुझे मेरी मां के पास ले चलो मैं उनके बगैर मक्का नहीं जाऊंगा.. चार दिन के सफर के बाद ये दोनों लोग मक्का पहुंचे, सारे रास्ते हमारे हुज़ूर (स.अ.) एक पल के लिए भी नहीं सोएं और बराबर रोते रहें..

जब हज़रत उम्मे ऐमन हमारे हुज़ूर (स.अ.) को लेकर मक्का पहुंची तो अब्दुल मुत्तलिब ने ऊंटनी की तरफ देखते हुए पूछा कि ऐ उम्मे ऐमन ! आमिना कहां है तुम तो तीन लोग गए थें फिर दो लोग क्यों वापस आए हो_? ये सुनकर हज़रत उम्मे ऐमन रोने लगीं और हमारे हुज़ूर भी दौड़कर अपने दादा से लिपट गएं, ये देख अब्दुल मुत्तलिब भी समझ गएं कि कोई बुरी खबर ज़रूर है, फिर हज़रत उम्मे ऐमन ने सारा किस्सा सुनाया तो दादा अब्दुल मुत्तलिब की भी आंखों से आंसू बहने लगें और अपने पोते मुहम्मद को गले से लगा लिया, शायद वो सोच रहे होंगे कि मेरे पोते पर इतनी छोटी उम्र में कितनी मुसीबतें आ रही हैं, बाप का साया तो देखा ही नहीं और अब मां भी छोड़कर चली गई..

हमारे हुज़ूर (स.अ.) के सारे चचा परेशान थें, सारी फूफिया परेशान थीं, हर एक का चेहरा उदास था और सब हमारे हुज़ूर को देखते जा रहे थें कि इस मासूम बच्चे को बचपन ही से कैसे कैसे ग़मो का सामना करना पड़ रहा है_

दोस्तों ! अम्मी की वफा़त के बाद वो क्या मंज़र होता होगा कि जब हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपने घर में जाते होंगे और अपनी अम्मी के बिस्तर, कपड़े और उनकी चीज़ें देखते होंगे तो इस 6 साल के यतीम बच्चे पर पर क्या गुज़रती होगी_ अम्मी की वफात के बाद हमारे हुज़ूर बहुत खामोश रहते थें, किसी से बात ना करतें_

इस वाक़िए के 57 सालों के बाद हमारे हुज़ूर (स.अ.) का गुज़र अपनी मां की कब्र के पास से हुआ, लाखों सहाबा इकराम का लश्कर हमारे हुज़ूर के साथ था, हुज़ूर (स.अ.) ने सहाबा इकराम से फरमाया कि तुम लोग इधर ही ‘ अबवा ‘ के मक़ाम पर अपने ख़ेमे लगा दो और फिर हमारे हुज़ूर (स.अ.) चलते हुए उस टीले पर पहुंचे जहां आपकी मां की क़बर बनी हुई थी_

उस वक्त हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपनी मां की क़बर से लिपटकर ऐसा रोएं थें कि सहाबा इकराम भी अपने आंसू ना रोक सकें, कई घंटों के बाद हमारे हुज़ूर (स.अ.) ने अपना सर उठाया और फरमाया कि ऐ काश ! मेरी मां ज़िंदा होती और मैं ज़ुहर की नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले पर खड़ा होता और मेरी मां पुकारती ” बेटा मोहम्मद ” तो मैं अपनी मां के लिए अपनी नमाज़ तोड़ देता…islamic story

बचपन में मां की वफात के बाद दादा अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पोते मुहम्मद को अपनी किफालत में ले लिया और फिर हमारे हुज़ूर (स.अ.) अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब के घर ज़िंदगी गुज़ारने लगें…


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