हुज़ूर (ﷺ) और नसतूरा राहिब {part-11} | Nastura Rahib story

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जब हमारे हुज़ूर (ﷺ) की उम्र 25 साल हुई तो एक दिन चचा अबू तालिब ने हुज़ूर (ﷺ) को बुलाकर कहा कि बेटा ! अब मैं बूढ़ा हो चुका हूं, तुम ही मेरा एक सहारा हो, और तुम तो देखते हो ना कि मैं बहुत गरीब हूं, कमाई का कोई ज़रिया नहीं है, इसलिए मैं चाहता हूं कि अब तुम तिजारत शुरू करो और अपना कारोबार करो, ताकि चार पैसे कमा सको_islamic waqia

ऐ बेटा मुहम्मद ! हमारे मोहल्ले की एक मालदार औरत ” खदीजा ” हैं, वो अपना तिजारती सामान लोगों के हाथों दूसरे शहरों में भेजती हैं और उससे नफा कमाती है, मैं चाहता हूं कि इस बार तुम उनका सामान लेकर ” शाम ” मुल्क जाओ और तिजारत करो, मुझे पूरा यकीन है कि अगर तुम खदीजा से जाकर कहोगे कि मैं तुम्हारा माल तिजारत के लिए ” शाम ” मुल्क ले जाना चाहता हूं तो वो कभी तुमसे मना नहीं करेंगी, क्योंकि उन्हें तुम्हारी इमानदारी और अमानतदारी के बारे में बहुत अच्छी तरह मालूम हैं और वो आजकल किसी ऐसे ही ईमानदार इंसान की तलाश में हैं_islamic waqia

हमारे हुज़ूर (ﷺ) ने अपने चचा अबू तालिब को जवाब दिया कि चचा जान ! खदीजा मुझे पहले ही तिजारत का पैगाम भेज चुकी हैं इसलिए मैं आपकी इजाज़त चाहता हूं, ये सुनकर अबू तालिब बहुत खुश हुएं और हुज़ूर (ﷺ) को जाने की इजाज़त दे दी_

जब हुज़ूर (ﷺ) तिजारत का सामान लेकर काफिले वालों के साथ जाने लगें तो हज़रत खदीजा ने अपने एक गुलाम मैसरा को हुज़ूर (ﷺ) के साथ कर दिया और उन्होंने” मैसरा ” से कहा कि इन साहब की किसी बात में भी मुखालिफत ना करना, ये जो भी कहें उनकी बात खामोशी से मान लेना_

Nastura Rahib story

और फिर हुज़ूर (ﷺ) ऊंट पर तिजारत का सामान लेकर चल दिएं, तो अबू तालिब ने हुज़ूर (ﷺ) से कहा कि बेटा मैं तुम्हें कभी भी अपने से जुदा करना नहीं चाहता था लेकिन मुझ पर ऐसी मजबूरी आ पड़ी है और घर में गरीबी का ऐसा आलम है कि मुझे मजबूरी में तुम्हें भेजना पड़ रहा है_ उस वक्त हुज़ूर (ﷺ) के सारे चचा भी मौजूद थें, उन्होंने काफिले वालों से कहा कि देखो हमारे भतीजे मोहम्मद का खास ख्याल रखना क्योंकि वो पहली बार तिजारत की खातिर शहर से बाहर जा रहे हैं, उन्हें इस बारे में ज्यादा तजुर्बा नहीं है इसलिए तुम लोग उनका ख्याल रखना_islamic waqia

और फिर ये काफिला ” शाम ” शहर की तरफ चल दिया, जैसे ही हुज़ूर (ﷺ) मक्का शहर से बाहर निकलें तो अल्लाह की तरफ से मोजिज़ों और करिश्मों की बारिश होने लगी, मैसरा गुलाम बयान करते हैं कि मैंने देखा कि तेज़ धूप में मुहम्मद के ऊपर एक बादल ने साया कर रखा है, हम सभी को धूप लग रही थी लेकिन मुहम्मद पर छांव थी, उन्हें धूप की सख़्ती बर्दाश्त नहीं करनी पड़ रही थी_

जब हुज़ूर (ﷺ) ” बसरा ” शहर पहुंचें तो एक पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम के लिए बैठ गएं, वो पेड़ ” नस्तूरा ” नाम के एक ईसाई आलिम के घर के सामने लगा हुआ था, जब हुज़ूर (ﷺ) उस पेड़ के नीचे जाकर बैठें तो अचानक उस ” नस्तूरा राहिब ” को इसकी खबर हो गई और वो जल्दी से अपने घर से बाहर निकला, हुज़ूर (ﷺ) को उस पेड़ के नीचे बैठा देख वो राहिब बहुत हैरान हुआ और उसने ” मैसरा गुलाम ” से पूछा कि ये कौन है_?

तो ” मैसरा गुलाम ” ने बताया कि ये कुरैश के खानदान से हैं और मक्का के रहने वाले हैं, इस पर उस ” नस्तूरा राहिब ” ने कहा कि आज तक इस पेड़ के नीचे नबी के अलावा कोई भी नहीं बैठ सका, मुझे पूरा यकीन है कि ये इंसान आगे चलकर कोई बड़ा आदमी बनेगा_

और फिर ” नस्तूरा राहिब ” चलता हुआ हुज़ूर (ﷺ) के पास पहुंचा और आपकी आंखों में देखते हुए ” मैसरा गुलाम ” से पूछने लगा कि क्या इस इंसान की आंखों में ये लाल डोरे हमेशा पड़े रहते हैं या कभी कभी ? तो ” मैसरा गुलाम ” ने जवाब दिया कि हां, इनकी आंखों में ये लाल डोरे हमेशा पड़े रहते हैं_ ये सुनकर वो ईसाई आलिम घबराकर कहने लगा कि ” हां हां फिर तो ये वही हैं जिनका हमारी किताबों में ज़िक्र आया है, ये वही हैं जिनके बारे में हमारे नबी ईसा मसीह ने कहा था कि मेरे बाद एक नबी आएगा और वो आखरी नबी होगा_islamic waqia

फिर वो ” नस्तूरा राहिब ” हुज़ूर (ﷺ) के पास आया और आपके सर को चूमा, फिर पैरों को चूमा और कहने लगा कि ऐ मोहम्मद ! आपके अंदर वो सारी निशानियां मौजूद हैं जो हमने अपनी किताबों में आखरी नबी की पढ़ी थीं, बस एक निशानी देखनी बाकी रह गई है इसलिए आप अपने कंधे से चादर हटाएं_!

तो हुज़ूर (ﷺ) ने जैसे ही कंधे से चादर हटाई तो ” नबुव्वत की मोहर ” चमक रही थी, ये देख वो ” नस्तूरा राहिब ” मोहरे नबुव्वत को चूमने लगा और कहने लगा कि मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं, ऐ काश ! मैं वो ज़माना पा लेता कि जब आपको नबी बनाया जाएगा_

इस वाक़िए के बाद हमारे हुज़ूर (ﷺ) ” बसरा ” शहर के बाज़ार में पहुंचें और अपना सामान बेचकर कुछ दूसरा सामान खरीदा, उस दौरान एक ईसाई आदमी हुज़ूर (ﷺ) से बहस करने लगा और कहने लगा कि अगर आप सच्चे हो तो ” लात व उज़्ज़ा ” बुतों की कसम खाओ, तो हुज़ूर (ﷺ) ने फरमाया कि मैं इन बुतों की कसम नहीं खाता बल्कि मैं अगर कभी इनके पास से गुज़रता भी हूं तो अपना चेहरा फेर लेता हूं_

इस पर उस ईसाई आदमी ने कहा कि मुझे पता था कि आपका यही जवाब होगा, और फिर वो ईसाई आदमी ” मैसरा गुलाम ” से अकेले में मिला और कहने लगा कि ऐ गुलाम ! तुम्हारे साथ जो ये आदमी आए हैं ये आने वाली नस्लों के नबी हैं, इनके अंदर वो सारी निशानियां मौजूद हैं जो हमारी पुरानी किताबों में आखिरी नबी के बारे में लिखी हुई हैं_islamic waqia

Muhammad story in hindi

कुछ दिन ” बसरा ” शहर में रहने के बाद ये काफिला वापस मक्का शहर की तरफ लौटा, इस बार काफिले वालों को अपनी तिजारत में बहुत ज़्यादा नफा हासिल हुआ_

रास्ते में लौटते वक्त एक वाकि़आ और पेश आया कि हज़रत खदीजा के दो ऊंट जो ” मैसरा गुलाम ” लेकर चल रहे थें वो दोनों बहुत कमजो़र और बीमार पड़ गएं, जिसकी वजह से वो चल नहीं पा रहे थें, इसलिए ” मैसरा गुलाम ” काफिले से पीछे रह गए और हुज़ूर (ﷺ) का ऊंट काफिले में सबसे आगे चल रहा था_

जब ” मैसरा गुलाम ” काफिले से पीछे होने लगें तो वो अपने बीमार ऊंट से उतरें और दौड़ते हुए काफिले में सबसे आगे हुज़ूर (ﷺ) के पास पहुंचें, और हुज़ूर (ﷺ) को सारी बातें बताईं तो हुज़ूर (ﷺ) ” मैसरा गुलाम ” के साथ उन दो बीमार ऊंटों के पास पहुंचें, हुज़ूर (ﷺ) ने उन ऊंटों की गर्दनों पर हाथ रखकर चुपके से कुछ पढ़ा तो अचानक उन दोनों ऊंटों में अजीब सी ताकत आ गई और वो बहुत तेज़ चलने लगें, ये देख काफिले वाले भी बहुत हैरान हुएं_islamic waqia

लौटते वक्त ” मैसरा गुलाम ” ने एक अजीब व गरीब चीज़ देखी कि जब भी धूप का वक्त होता तो हुज़ूर (ﷺ) पर दो फरिश्ते आकर छांव कर लेतें और उन्हें धूप न लगती, उन फरिश्तों को ” मैसरा गुलाम ” ने खुद अपनी आंखों से देखा था और कुछ काफिले वालों ने भी उन फरिश्तों को देखा था_

” मैसरा गुलाम ” ने आकर हुज़ूर (ﷺ) से कहा कि ऐ मोहम्मद ! मैं पिछले कई सालों से खदीजा के लिए तिजारत कर रहा हूं लेकिन आज तक मुझे कभी इतना ज़्यादा नफा नहीं हुआ जितना कि इस बार हुआ है_

आखिर ये काफ़िला मक्का पहुंचा_ हमारे हुज़ूर (ﷺ) दोपहर के वक्त मक्का में दाखिल हुएं, उस वक्त हज़रत खदीजा अपने घर की छत पर कुछ काम कर रही थीं कि तभी उन्होंने आसमान में दो फरिश्तों को देखा जो किसी इंसान पर साया किए हुए थें, ये देख हज़रत खदीजा बहुत हैरान हुई_ जब वो इंसान करीब पहुंचा तो हज़रत खदीजा ने देखा कि वो कोई और नहीं बल्कि हुज़ूर (ﷺ) थें, ये देख हज़रत खदीजा बहुत हैरान हुई_

और फिर शाम को ” मैसरा गुलाम ” ने हज़रत खदीजा को हुज़ूर (ﷺ) के मोजिज़ों के बारे में और उस ” नस्तूरा राहिब ” के बारे में सबकुछ बताया और फरमाया कि ऐ हमारी सैय्यदा ! आज तक कभी मुझे तिजारत में इतना ज़्यादा नफा नहीं हुआ कि जितना इस बार हुआ है,

” मैसरा गुलाम ” हज़रत खदीजा के सामने हुज़ूर (ﷺ) की मुसलसल तारीफें करता जा रहा था, इस वजह से हज़रत खदीजा के दिल में हुज़ूर (ﷺ) की इज्ज़त बैठ गई और उन्होंने फैसला कर लिया कि मैं मोहम्मद से निकाह करने का पैगाम भेजती हूं_islamic waqia



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