बचपन में हुज़ूर (ﷺ) को जब ” बुहैरा जादूगर ” ने देखा {part-10} | Buhaira Jadugar story

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अम्मी और दादा की वफात के बाद हमारे हुज़ूर (ﷺ) बहुत ज़्यादा परेशान रहते थें, दिल गमगीन रहता, किसी से बात ना करते थें, दादा की वफात के बाद हमारे हुज़ूर (ﷺ) के चचा अबू तालिब ने ही हमारे हुज़ूर (ﷺ) को अपनी निगरानी में पाला, वो अपने लड़कों से ज़्यादा हमारे हुज़ूर (ﷺ) का ख्याल रखतें थें_islamic waqia

एक बार मक्का में बारिश नहीं हो रही थी तो हज़रत अबू तालिब हमारे हुज़ूर (ﷺ) को लेकर काबा के पास पहुंचें और हुज़ूर (ﷺ) की कमर काबा से लगाकर अल्लाह से दुआ की तो अचानक आसमान पर बादल छाने लगें और फिर इतनी तेज़ बारिश हुई कि मक्का की गलियों में पानी बहने लगा_

हज़रत अबू तालिब बहुत ज़्यादा गरीब थें, घर में खाने को नहीं होता था, इसलिए हुज़ूर (ﷺ) बचपन में मक्का वालों की बकरियां चराया करते थें ताकि घर में रोटी का इंतज़ाम हो सके_ रिवायतों में आता है कि एक दिन हुज़ूर (ﷺ) बकरियां चराकर वापस लौट रहे थें, अम्मी और दादा की वफात का ग़म इतना ज़्यादा था कि चेहरे पर उसके आसार नज़र आते थें, हमारे हुज़ूर (ﷺ) परेशान बकरियों को हंकाते हुए घर की तरफ बढ़ रहे थें, पैरों में चप्पल भी नहीं थीं सिर्फ एक तहबंद बांध रखा था, तेज़ कड़ी धूप थी, गर्मी की वजह से चेहरा लाल पड़ गया था, और इसी हालत में हमारे हुज़ूर (ﷺ) बकरियों को लेकर घर पहुंचें_

हमारे हुज़ूर (ﷺ) को अकेले होने का बहुत एहसास रहता था कि ना मेरी मां है, ना बाप है, ना कोई भाई- बहन है, ये ग़म हर वक्त हुज़ूर (ﷺ) के दिल पर ऐसा सवार रहता कि आप (ﷺ) अक्सर अकेले खामोश बैठे रहतें, मुहल्ले के बच्चों के साथ भी ना खेलतें_

हज़रत अबू तालिब हमारे हुज़ूर (ﷺ) का पूरा ख्याल रखतें थें, जब भी खाना खाने बैठतें तो हुज़ूर (ﷺ) को अपने साथ बिठातें थें_ जब हमारे हुज़ूर (ﷺ) की उम्र 12 साल हुई तो एक दिन अबू तालिब ने ” शाम ” शहर की तरफ तिजारत के लिए जाना चाहा तो हमारे हुज़ूर (ﷺ) को बुलाकर कहा कि ऐ मेरे बेटे ! मैं कुछ महीनों के लिए ” शाम ” शहर कारोबार के लिए जाना चाहता हूं इसलिए तुम अपना ख्याल रखना, हुज़ूर (ﷺ) फरमाने लगें कि ऐ मेरे चचा ! आपको तो पता है ना कि यहां मक्का में मेरा आपके अलावा कोई भी नहीं है, मैं अकेला हूं, आपके बगैर कैसे रहूंगा, इसलिए आप मुझे भी अपने साथ ले चलिए_

भतीजे की ज़िद और शौक देखकर हज़रत अबू तालिब ने कहा कि ठीक है बेटा, चलो तुम भी तैयार हो जाओ, और फिर अबू तालिब हुज़ूर (ﷺ) को लेकर ” शाम ” शहर की तरफ चल दिएं, उस क़ाफिले में सौ से ज़्यादा आदमी थें_

ये काफ़िला चलता- चलता जब ” शाम ” शहर के करीब पहुंचा तो इन क़ाफिले वालों का गुज़र ईसाइयों के एक बहुत बड़े आलिम व जादूगर के पास से हुआ जिसका नाम ” बुहैरा ” था, उस ” बुहैरा जादूगर ” ने शाम की तरफ जाने वाले रास्ते ही में एक तरफ अपना छोटा सा घर बना रखा था और उसी में कुछ खादिमों के साथ रहता था, क्योंकि उसने पढ़ रखा था कि एक दिन इसी रास्ते से इस दुनिया का आखिरी नबी गुज़रेगा, उसी नबी के इंतज़ार में ” बुहैरा जादूगर ” ने उस रास्ते पर अपना घर बनवाया और रोज़ सुबह वो छत पर चढ़कर मक्का की तरफ से आने वाले काफिलों को बहुत गौर से देखता_

Buhaira Jadugar story

जिस दिन हज़रत अबू तालिब उस काफिले के साथ हमारे हुज़ूर (ﷺ) को लेकर ” बुहैरा जादूगर ” के घर के पास से गुज़रें तो उस जादूगर ने दूर ही से इस काफिले को देखकर पहचान लिया कि ये वही काफिला है जिसमें आखरी नबी होगा, क्योंकि उसने देखा कि रास्ते का हर पेड़ व पत्थर उस काफिले वालों को सजदा कर रहा है इसलिए वो समझ गया कि ज़रूर इसी काफ़िले में वो नबी है_

वो जादूगर जल्दी से छत से नीचे उतरा और अपने खादिमों को बुलाकर कहा कि आज इन काफिले वालों के लिए खाना तैयार करो मैं इनकी दावत करूंगा_ इतनी देर में वो काफिला आ पहुंचा जिसमें हमारे हुज़ूर (ﷺ) अपने चचा अबू तालिब के साथ थें_

ये काफिला उस ” बुहैरा जादूगर ” के घर के पास ही एक बड़े पेड़ के नीचे आकर बैठ गया, ” बुहैरा जादूगर ” अपने घर से निकला और इस काफिले वालों को आकर बहुत गौर से देखने लगा, फिर अचानक उसकी नज़र हमारे हुज़ूर (ﷺ) पर पड़ी, हमारे हुज़ूर (ﷺ) उस वक्त अपने चचा अबू तालिब के पास खामोश बैठे थें , आप (ﷺ) को देखते ही ” बुहैरा जादूगर ” पहचान गया और फिर उसने काफिले वालों से कहा कि आज दोपहर को तुम सबकी मेरे घर दावत है_

ये सुनकर काफिले वालों को बहुत हैरानी हुई कि हम तो अक्सर इस राह से गुज़रते रहते हैं इस जादूगर ने आजतक हमसे कभी बात तक नहीं की तो आज इसे क्या हो गया है कि ये हम सबकी दावत कर रहा है ? तो काफिले वालों में से एक आदमी ने पूछा कि ऐ जादूगर ! आज तक तो आपने कभी हमारी दावत नहीं की तो फिर आज क्यों हमारी दावत कर रहे हैं? तो उस जादूगर ने बात को टालते हुए कहा कि तुम हमारे मेहमान हो और मेहमान की इज्ज़त करना हमारा मज़हब है इसीलिए हमने तुम सब की दावत की है उस जादूगर ने किसी को कुछ भी ना बताया…islamic waqia

दोपहर का वक्त हो चुका था खाना तैयार था, काफिले वाले इधर-उधर बिखर चुके थें, तो ” बुहैरा जादूगर ” ने अपने एक खादिम से कहा कि सारे क़ाफिले वालों को जमा करो और उनके लिए खाना लगाओ, खादिम ने आवाज़ देकर सारे काफिले वालों को जमा किया_ सब उसी बड़े पेड़ के नीचे आकर बैठ गए और सबके लिए खाना लगा दिया गया..

” बुहैरा जादूगर ” बराबर नज़रे दौड़ाकर इधर- उधर देख रहा था लेकिन उसे हुज़ूर (ﷺ) नज़र नहीं आ रहे थें, तो उसने काफी देर बाद काफिले वालों से पूछा कि तुम में से कोई बचा तो नहीं है ? तो लोगों ने जवाब दिया कि नहीं, हमारे सारे लोग मौजूद हैं लेकिन हां एक बच्चा है वो यहां नहीं आया है, उस जादूगर ने पूछा कि वो बच्चा कहां है ? लोगों ने बताया कि वो हमारे ऊंट चराने गया है, ” बुहैरा जादूगर ” ने कहा कि तुम्हारा बुरा हो अरे मैंने उसी बच्चे की वजह से तुम सबकी दावत की है, जल्दी से जाओ और उस बच्चे को बुलाकर लाओ_

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हज़रत अबू तालिब ने एक आदमी को भेजा कि जाओ और मेरे भतीजे को बुला लाओ_ जब हमारे हुज़ूर (ﷺ) काफिले की तरफ आ रहे थें तो ” बुहैरा जादूगर ” दूर ही से हुज़ूर (ﷺ) को बहुत ग़ौर से देख रहा था, उसने देखा कि एक बादल ने हमारे हुज़ूर (ﷺ) पर साया कर रखा है जिसकी वजह से हमारे हुज़ूर (ﷺ) को बिल्कुल भी धूप नहीं लग रही है और हर तरफ तेज़ धूप फैली हुई है _

हमारे हुज़ूर (ﷺ) चलते हुए उस पेड़ के पास पहुंचें तो देखा कि पेड़ के साए में कहीं भी जगह नहीं बची थी, सारे काफिले वाले पेड़ के साए में बैठे हुए थें, जब हुज़ूर (ﷺ) को साए में कहीं भी जगह ना मिली तो हमारे हुज़ूर (ﷺ) धूप ही में बैठ गएं, जैसे ही हमारे हुज़ूर (ﷺ) धूप में बैठें कि तभी अचानक पेड़ की कुछ टहनियां खुद-ब-खुद मुड़ने लगीं और उनका साया धीरे-धीरे हुज़ूर (ﷺ) की तरफ आने लगा_

ये सब देखकर ” बुहैरा जादूगर ” बहुत हैरान हुआ और पूछने लगा कि इस बच्चे का मालिक कौन है ? हज़रत अबू तालिब ने कहा कि मैं हूं, ” बुहैरा जादूगर ” ने पूछा कि तुम इसके कौन हो ? हज़रत अबू तालिब ने जवाब दिया कि मैं इसका बाप हूं, जादूगर ने कहा कि तुम झूठ बोल रहे हो, मेरा इल्म कहता है इस बच्चे का बाप मर चुका है, ये सुनकर अबू तालिब ने कहा कि हां तुम सच कह रहे हो, मैं इसका चचा हूं उसके बाप की वफात इसकी पैदाइश से पहले ही हो गई थी_

फिर ” बुहैरा जादूगर ” ने हुज़ूर (ﷺ) को अपने पास बुलाया और आपकी पीठ से कपड़ा हटाकर देखा तो ” मोहर ए नुबुव्वत ” चमक रही थी, ये देख ” बुहैरा जादूगर ” की ज़ुबान से एक ‘ आह ‘ निकली और उसने हुज़ूर (ﷺ) का हाथ पकड़ते हुए कहा कि ऐ लोगों ! तुम्हें पता भी है कि ये बच्चा कौन है, मैंने अपनी सारी ज़िंदगी इसी बच्चे के इंतजार में गुज़ार दी, क्योंकि मैंने पढ़ रखा था की एक दिन ये बच्चा इसी रास्ते से गुज़रेगा_islamic waqia

ऐ लोगों ! ये बच्चा आने वाली नस्लों का नबी है इसके पास आसमान से फरिश्ते आएंगे और इसे आगे चलकर नबी बनाया जाएगा_ ये सुनकर काफिले वाले बहुत हैरान हुए और पूछने लगें कि ऐ जादूगर ! तुम्हें कैसे मालूम हुआ ये बच्चा हमारे ही काफिले में है ? ” बुहैरा जादूगर ” ने कहा कि जिस वक्त तुम आ रहे थे तो मैंने देखा कि रास्ते का हर पेड़ व पत्थर इस बच्चे को सजदा कर रहे हैं, ये देख मैं समझ गया कि ज़रूर इसी काफिले में वो नबी है जिसका मैं बरसों से इंतज़ार कर रहा हूं_



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