हमारे हुज़ूर (ﷺ) और एक जादूगर पर {part-9} | prophet Muhammad story

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” ऐ मक्का वालो ! तुम्हारे बीच एक नबी आने वाला है और उस नबी के ज़ाहिर होने का वक्त करीब आ चुका है, उस नबी की वजह से तुम्हें ज़िंदगी मिलेगी और तुम पर खूब बारिशें होंगी, तुम्हारी फसलों और जानवरों में बरकत होगी, ऐ मक्का वालों ! अगर तुम अपने इलाक़े में बारिश करवाना चाहते हो तो अपनों में से एक ऐसे इंसान को तलाश करो कि जिसका रंग गोरा हो, क़द लंबा हो, और उसकी पलकें घनी हों, और भौएं आपस में मिली हों, वो इंसान अपने सारे लड़कों को लेकर निकले और तुम में से हर खानदान का एक इंसान उस आदमी के साथ जाए, सब पाक- साफ होकर अच्छे कपड़े पहनें और खुशबू लगाएं और सबसे पहले जाकर काबा के पास ” हजरे अस्वद ” को चूमें, और फिर सामने वाले पहाड़ ” जबल ए अबू क़बीस ” पर चढ़ जाएं_islamic waqiat

एक बार मक्का शहर में बहुत सूखा पड़ गया, कई सालों से बारिश नहीं हो रही थी, जानवर भी प्यास से मरते जा रहे थें, लोगों की हालत बहुत खराब थी, सब मौत की कगार पर थें कि उन्हीं दिनों में हमारे हुज़ूर (ﷺ) की दादी और हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की बीवी ” हज़रत रुक़य्या ” ने एक ख्वाब देखा कि कोई कह रहा है कि..

उस पहाड़ पर पहुंचकर वो आदमी जिसके बारे में ऊपर बताया गया है वो बैठकर बारिश की दुआ करे, और सारे लोग ” आमीन ” कहें, तो बारिश हो जाएगी_

सुबह उठकर हमारे हुज़ूर (ﷺ) की दादी ” रुक़य्या ” ने ये ख्वाब जब मक्का वालों को बताया तो सब हैरान रह गएं और कहने लगें कि ये ख्वाब कोई आम ख्वाब नहीं है , बल्कि अल्लाह की तरफ से हमें पैगाम भेजा गया है कि हम इस तरह पहाड़ पर चढ़कर दुआ मांगे तो हम पर बारिश होगी, इसलिए चलो और उस आदमी को तलाश करो कि जिसके बारे में ख्वाब में बताया गया है…

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मक्का वालों ने उस आदमी को तलाश करना शुरू कर किया तो वो सारी खूबियां जो ख्वाब में बयान की गई थी हमारे हुज़ूर के दादा अब्दुल मुत्तलिब के अंदर निकल आई, लोगों ने आकर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब से कहा कि आप ही हमारे सरदार हो और आप ही के अंदर वो सारी खूबियां हमें नज़र आ रही हैं जो ख्वाब में बताई गई हैं इसलिए आप चलकर हमारे लिए बारिश की दुआ करें_

अब्दुल मुत्तलिब ने अपने सारे लड़कों को जमा किया और मक्का के हर घर से एक आदमी को साथ लेकर काबा के पास आएं, और ” हजर ए अस्वद ” को चूमा और फिर ” जबल ए अबू क़बीस ” पहाड़ पर चढ़ गएं, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने पहाड़ पर चढ़कर बारिश की दुआ की और सभी लोगों ने आमीन कहा, अभी दुआ खत्म भी नहीं हुई थी कि अचानक आसमान पर काले बादल छाने लगें और फिर देखते ही देखते बहुत तेज़ बारिश शुरू हो गई_

जब हमारे हुज़ूर (ﷺ) की उम्र सात साल की हुई तो एक दिन हमारे हुज़ूर (ﷺ) की आंखों में दर्द होने लगा और आप बहुत परेशान हो गएं तो हमारे हुज़ूर (ﷺ) के दादा अब्दुल मुत्तलिब आप (ﷺ ) को लेकर एक जादूगर के पास गएं, अब्दुल मुत्तलिब ने उस जादूगर का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन उसने दरवाजा ना खोला,

जब उस जादूगर ने बहुत देर तक दरवाज़ा ना खोला, और हमारे हुज़ूर (ﷺ) अपने दादा के साथ बाहर खड़े रहें तो अचानक उस जादूगर के घर में ज़मीन हिलने लगीऔर ज़लज़ला आ गया, तो वो घबराकर बाहर निकला_ जब उस जादूगर की नज़र हमारे हुज़ूर (ﷺ) पर पड़ी तो वो हैरान रह गया और कहने लगा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! ये बच्चा तुम्हारा कौन है ? हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ये मेरा पोता है और अब्दुल्लाह का बेटा है_

तो उस जादूगर ने कहा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! यह लड़का इस उम्मत का नबी है अगर मैं अभी अपने घर से बाहर ना निकलता तो घर की छत मुझ पर गिर जाती, ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! तुम इस लड़के की हिफाज़त करना और इसे यहूदियों से बचाकर रखना वरना अगर वो लोग इसे देख लेंगे तो इसे कत्ल कर देंगे, और रही बात इस बच्चे की आंखों में दर्द की, तो इसका इलाज खुद इस बच्चे के पास मौजूद है_

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ये सुनकर अब्दुल मुत्तलिब बहुत हैरान हुएं और पूछने लगें कि ऐसा कैसे ? तो उस जादूगर ने जवाब दिया कि जाओ घर जाओ, और इस बच्चे के मुंह में उंगली रखकर उसका थूक उसकी आंखों में लगा दो फिर देखना कि इसकी आंखें खुद ब खुद ठीक हो जाएंगी, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने घर आकर यही किया और हुज़ूर (ﷺ) की आंखें बिल्कुल ठीक हो गई_

अब्दुल मुत्तलिब अपने पोते हुज़ूर (ﷺ) का बहुत ज़्यादा ख्याल रखते थें, जब भी खाना खाने बैठतें तो जब तक हमारे हुज़ूर (ﷺ) ना आ जातें तब तक घर में कोई भी खाना शुरु ना करता, और अल्लाह के रसूल की ये बरकत होती कि जब भी खाना कम होता तो हमारे हुज़ूर (ﷺ) अगर उस खाने में शरीक होतें तो वो कम खाना भी सबके लिए काफी हो जाता और आखिर में खाना बच भी जाता_

दादा अब्दुल मुत्तलिब के पास हमारे हुज़ूर (ﷺ) को अभी 2 साल भी नहीं गुजरे थें कि अचानक एक दिन अब्दुल मुत्तलिब के दर्द उठा और उन्हें मौत के आसार नज़र आने लगें तो उन्होंने अपने बेटे ” अबू तालिब ” को बुलाया और कहा कि ऐ अबू तालिब ! अभी तक मैं अपने पोते मोहम्मद का हर तरह से ख्याल रखता आया हूं और उसे किसी कमी का एहसास ना होने दिया, अब यह बच्चा मैं तुम्हारे हवाले करता हूं, इसलिए इसकी खूब देखभाल करना और इस पर गुस्सा ना होना_ इतना कहकर अब्दुल मुत्तलिब की वफात हो गई_

दादा की वफात पर हमारे हुज़ूर (ﷺ) बहुत ज़्यादा रोएं और परेशान हुए कि अब मेरा क्या होगा ? लेकिन जिसकी हिफाज़त खुदा करें उसके मददगार तो ज़मीन – आसमान भी बन जाते हैं_ हज़रत अब्दुल मुत्तलिब को मक्का ही में ” हजून ” नाम की एक जगह पर दफन किया गया, जिस वक्त दादा अब्दुल मुत्तलिब का जनाजा़ उठा और लोग उन्हें कब्रिस्तान की तरफ ले जाने लगें तो हमारे हुज़ूर (ﷺ) जनाजे़ के पीछे पीछे रोते हुए चल रहे थें_

एक बार एक सहाबी ने हमारे हुज़ूर (ﷺ) से पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल ! क्या आपको अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब की वफात के बारे में कुछ याद है ? तो हुज़ूर (ﷺ) ने फरमाया कि हां हां, मुझे याद है, मेरी उम्र उस वक्त 8 साल थी_


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