हुज़ूर (ﷺ) की पैदाइश का वाक़िआ- part 1 | Life of prophet Muhammad

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Life of prophet Muhammad

Life of prophet Muhammad

  हुज़ूर (स.अ.)की पैदाइश से पहले सारी दुनिया में बहुत ज़्यादा गुमराही फैली हुई थी, अरब में तो लोग बुतरस्ती के इतने आदी बन चुके थें कि वो जब भी सफर पर जातें तो अपने साथ अपने बुतों को भी लेकर जाते थें, उनमें गुमराही और जिहालत इतनी ज़्यादा थी कि वो अपनी लड़कियों को ज़िंदा दफन कर देते थें ताकि किसी को अपना दामाद ना बनाना पड़े_ इस गुमराही के दौर में हुज़ूर (स.अ.) की पैदाइश हुई.. लेकिन पैदाइश से पचासों साल पहले ही से आप (स.अ.) के लिए माहौल तैयार किया गया…

  रिवायतों में आता है कि ‘ ज़मज़म का कुआं ‘ जो हज़रत इस्माइल (अ.) की एड़ियों से जारी हुआ था उसे बाद में एक कबीले वोलों ने दुश्मनी में आकर बंद कर दिया था और उसमें बालू व पत्थर डालकर उसको बराबर कर दिया था_ इसी तरह तीन सौ साल गुज़र गए और ‘ ज़मज़म का कुआं ‘ इसी तरह बंद रहा और लोग भूल गएं कि यहां मक्का में कोई ‘ ज़मज़म का कुआं ‘ भी था…

Life history of prophet muhammad from birth to death

  एक दिन हुज़ूर (स.अ.)के दादा ‘ अब्दुल मुत्तलिब ‘ रात में सोए हुए थें तो उन्हें ख्वाब में एक इंसान नज़र आया जो कह रहा था कि ‘ पाक पानी का कुआं ‘ खोदो.. अब्दुल मुत्तलिब अभी उस इंसान से कुछ पूछते कि उतनी ही देर में उनकी आंख खुल गई और वो परेशान हो गएं कि आखिर ये कौन इंसान था जो मुझसे कह रहा था कि पाक पानी का कुआं ‘ खोदो, और ये पाक पानी का कुआं ‘ कहां है..??

 अगली रात जब फिर से सोए तो वही इंसान उन्हें फिर से नज़र आया वो कह रहा था कि ‘ पाक पानी का कुआं ‘ खोदो.. अभी अब्दुल मुत्तलिब उस आदमी से कुछ पूछतें कि उनकी आंख फिर से खुल गई…

 तीसरी रात हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने फिर से वही ख्वाब देखा तो आज ख्वाब ही में उस इंसान से पूछने लगें कि आखिर ये पाक पानी का कुआं क्या है और कहां पर है.. ? उस इंसान ने जवाब दिया कि यह ज़मज़म का कुआं है जो तुम्हारे दादा इस्माइल के लिए जारी किया गया था और तीन सौ सालों से बंद पड़ा है, ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! तुम सुबह काबा शरीफ़ के पास जाकर बैठ जाना, एक कौवा आएगा और एक जगह पर तीन बार अपनी चोंच मारेगा, बस समझ जाना कि ज़मज़म का कुआं उसी जगह पर है…

  सुबह अब्दुल मुत्तलिब काबे के पास जाकर बैठ गएं_ कई घंटे गुज़र गएं, दोपहर का वक्त था लेकिन अभी तक कोई कौवा नहीं आया था, वो उठकर अपने घर की तरफ जाने लगें तभी अचानक वहां एक कौवा बोलता हुआ आया और फिर एक जगह पर तीन बार अपनी चोंच मारी और उड़ गया, अब्दुल मुत्तलिब समझ गएं कि वो ज़मज़म का कुआं इसी जगह पर है…

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने उसी वक्त तमाम मक्का वालों को जमा किया और कहा कि ऐ मक्का वालों ! वह ज़मज़म का कुआं जो हमारे बाप इस्माइल (अ.) के लिए जारी किया गया था वो इसी जगह पर है_ मुझे ख्वाब में अल्लाह की तरफ से बताया गया है कि उस ज़मज़म के कुएं को जाकर खोदो जो तीन सौ सालों से बंद पड़ा है.. ये सुनकर मक्का वाले कहने लगें कि ” अरे अब्दुल मुत्तलिब ! कहां तुम इन चक्करों में पड़े हो, उस ज़मज़म के कुएं को बंद हुए तीन सौ साल गुज़र चुके हैं, अब तो वह बिल्कुल खत्म हो गया होगा और उस कौवे का क्या भरोसा कि हम इस क़दर मेहनत करें और फिर हमें कुआं ना मिले तो हमारी तो मेहनत बर्बाद हो जाएगी..”

इतना कहकर मक्का वाले अपने घरों को वापस चले गएं_ अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ऐ लोगों ! मैं तो ये कुआं ज़रूर खोदूंगा मुझे अल्लाह पर पूरा भरोसा है… अब्दुल मुत्तलिब का उस वक्त सिर्फ एक ही लड़का था उनका नाम ” हरिस ” था, उसी को साथ लेकर अब्दुल मुत्तलिब वो कुआं खोदने लगें…

उस वक्त मक्का की ज़मीन पथरीली थी वहां मिट्टी नहीं थी बल्कि ज़मीन पर पत्थर ही पत्थर थें_ इसीलिए ये दोनों बाप बेटे छेनी- हथौड़ी से उन पत्थरों को दिन-रात तोड़ते थें, रोज़ाना सुबह को आ जातें और पत्थरों को तोड़ना शुरू कर देतें, इसी तरह कई महीनें गुज़र गए लेकिन ज़मज़म का कुआं नहीं मिला_ अब तो लोगों ने मज़ाक उड़ाना भी शुरू कर दिया…life of prophet muhammad in hindi

एक दिन दोपहर की कड़ी धूप में पत्थरों को तोड़ते हुए हज़रत अब्दुल मुत्तलिब बहुत ज्यादा परेशान हो गएं तो अल्लाह के सामने हाथ फैलाकर कहने लगें कि ” ऐ मेरे मौला ! अगर आज मुझे ज़मज़म का कुआं मिल गया तो अगर आपने जिंदगी में मुझे दस लड़कें दिएं तो उसमें से एक लड़का आपकी राह में कुर्बान कर दूंगा..” ये दुआ मांगने के बाद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने छेनी हथौड़ी से जैसे ही अगले पत्थर पर वार किया तो एकदम से पानी का एक फव्वारा ऊपर को उठा और फिर देखते ही देखते नीचे से पानी निकलने लगा…

पानी निकलता देख सारे मक्का वाले जमा हो गएं और बहुत खुश हुएं, क्योंकि मक्का में पानी आसानी से नहीं मिलता था_ अब्दुल मुत्तलिब ने कहा : भाग जाओ ऐ
मक्का वालों यहां से, आज से इस ज़मज़म के कुएं पर सरदारी मेरे खानदान की रहेगी लेकिन हां तुम सब इसका पानी पी सकते हो…

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ज़माना गुजरता गया_ हज़रत अब्दुल मुत्तलिब को अल्लाह ताला ने पंदरह लड़के दिएं तो जब सारे लड़के जवान हो गएं तो एक दिन अब्दुल मुत्तलिब ने अपने सारे लड़कों को जमा करके कहा है कि ” ऐ मेरे बच्चों ! जब मैं ज़मज़म का कुआं खोद रहा था तो मैंने अल्लाह से नज़र मानी थी कि अगर ये ज़मज़म का कुआं मुझसे आसानी से खुद गया तो मैं अल्लाह की राह में एक लड़के को कुर्बान करूंगा, मेरे बच्चों ! क्या तुम कुरबान होने के लिए तैयार हो..?

सारे लड़कों ने कहा : अब्बा जान ! आप हम पंदरह लड़कों में से जिसका भी हाथ पकड़ लेंगे वो अल्लाह की राह में कुर्बान होने के लिए तैयार हैं_ अब्दुल मुत्तलिब कहने लगें कि मैं ऐसा नहीं करूंगा ये नाइंसाफी होगी इसलिए मैं पंदरह पर्चियां बनाऊंगा और सब में लिखूंगा कि ” इस लड़के को नहीं ज़बह करना है ” लेकिन एक पर्ची में लिख दूंगा कि ” इस लड़के को ज़बह कर देना है “_ अब वो पर्ची जिस लड़के के हाथ में आएगी उसे अल्लाह के लिए ज़बह होना पड़ेगा.. सब ने कहा ठीक है अब्बा जान, हम तैयार हैं…

पर्चियां बनाकर लुटाई गईं_ सारे लड़कों ने अपनी-अपनी पर्चियां खोलीं तो सबके में निकला कि ” इस लड़के को नहीं ज़बह करना है “, लेकिन जब हुज़ूर (स.अ.) के बाप हज़रत अब्दुल्ला ने अपनी पर्ची खोली तो उसमें लिखा था कि ” इस लड़के को ज़बह कर देना है “_ ज़बह वाली पर्ची हज़रत अब्दुल्ला के हाथ में देखकर अब्दुल मुत्तलिब भी तड़प उठें क्योंकि हज़रत अब्दुल्ला लड़कों में सबसे छोटे थें और बहुत ज़्यादा खूबसूरत थें, अब्दुल मुत्तलिब अपने सारे लड़कों में सबसे ज़्यादा अब्दुल्ला से मोहब्बत करते थें और मक्का वाले भी हज़रत अब्दुल्ला से उनकी शराफत की वजह से बहुत मोहब्बत करते थें…

लेकिन अब्दुल मुत्तलिब सरदार आदमी थें इसलिए अपनी ज़ुबान से पीछे नहीं हट सकते थे, एक छुरी उठाई और अब्दुल्लाह को ज़बह करने के लिए खड़े हो गएं.. जब मक्का वालों को खबर हुई कि अब्दुल मुत्तलिब अपने बेटे अब्दुल्ला को ज़बह करने जा रहे हैं तो सारे मक्का वाले जमा हो गएं और अब्दुल मुत्तलिब से बहस करने लगें कि कुछ भी हो जाए हम अब्दुल्ला को ज़बह नहीं होने देंगे, अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ऐ मक्का वालों ! हट जाओ मेरे रास्ते से, मैं अल्लाह से नज़र मान चुका हूं कि मैं अपने दस लड़कों में से किसी एक को अल्लाह के लिए ज़बह करूंगा.. इतनी देर में ” आस बिन वाइल ” जो मक्का के बड़े सरदारों में से थें वो सामने आकर खड़े हो गएं और कहने लगें कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! आज चाहे तलवारें चल जाए और खून की नदियां बह जाएं फिर भी हम अब्दुल्ला को ज़बह नहीं होने देंगे…

अब्दुल मुत्तलिब ने जब देखा कि सारे मक्का वाले एक तरफ हैं और मैं अकेला दूसरी तरफ हूं तो कहने लगें कि ऐ मक्का वालों ! एक शर्त पर मैं अब्दुल्ला को छोडूंगा वो ये है कि ” नजरान ” में जो एक जादूगर औरत है अगर वो कह दे कि अब्दुल्ला को ना ज़बह करो तो मैं ज़बह नहीं करूंगा वरना आज मैं अब्दुल्लाह को ज़बह करके रहूंगा_ मक्का वालों ने कहा : ठीक है, हम ” नजरान ” चलेंगे और उस औरत से मालूम करेंगे_ वो जो कहेगी हम उसके लिए तैयार हैं…

और फिर एक बहुत बड़ा काफिला मक्के से ” नजरान ” की तरफ रवाना हुआ_ चार सौ किलोमीटर दूर नजरान का सफर करके ये तमाम लोग उस जादूगर औरत के पास पहुंचें और उसे सारी बातें बताई तो उस जादूगरनी ने कहा कि ” तुम लोगों में अगर किसी बंदे को क़त्ल कर दिया जाता है तो उसके बदले में तुम क्या मुआवजा लेते हो..?” सबने बताया कि ” हम उसके बदले में दस ऊंट मुआवजा़ लेते हैं.. उस जादूगरनी ने कहा_ ” तो फिर एक पर्ची में दस ऊंठ लिखो और दूसरी पर्ची में अब्दुल्ला का नाम लिखो और पर्ची उड़ाओ, फिर अब्दुल मुत्तलिब उनमें से एक पर्ची को उठाएं, अगर उस पर्ची में अब्दुल्लाह का नाम निकले तो दूसरी पर्ची पर दस ऊंठ और बढ़ा दो और अब्दुल्लाह को बचा लो_ इस तरह जब तक अब्दुल्लाह का नाम निकलता रहे तब तक दूसरी पर्ची पर दस-दस ऊंठ बढ़ाते जाओ, और जब खुलने वाली पर्ची पर ऊंटों का नाम निकल आए तो अब्दुल्ला को बचा लो और उतने ऊंटों को ज़बह कर दो…


सारे लोगों को यह फैसला बहुत पसंद आया और फिर मक्का वापस आकर पर्चियां बनाई गई_ हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने अपने सौ ऊंट ” सफा ” पहाड़ के पास लाकर खड़े कर दिएं और दूसरी तरफ हुज़ूर (स.अ.) के बाप हज़रत अब्दुल्लाह खड़े हो गएं , पर्चियां बनाकर उड़ाई गईं तै अब्दुल मुत्तलिब ने जब पर्ची खोली तो उसमें लिखा निकला कि ” अब्दुल्ला को ज़बह कर दो ” यह पढ़कर दूसरी पर्ची पर दस ऊंट बढ़ा दिए गए, और दोबारा पर्ची उड़ाई गई तो फिर से” अब्दुल्ला ” का नाम निकला_ ये देखकर दूसरी पर्ची पर फिर से दस ऊंट बढ़ा दिएं गए, करते-करते 90 ऊंट बढ़ा दिए गएं क्योंकि हर बार हज़रत अब्दुल्ला ही का नाम निकलता जा रहा था कि ” इन्हें ज़बह कर दो “..

our prophet muhammad life

आख़िर में हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ” ऐ लोगों ! ये आखरी बार होगा_ अगर इस बार भी अब्दुल्ला का नाम निकलता है तो मैं अब्दुल्लाह को ज़बह कर दूंगा_ सभी लोग खामोश खड़े थें, अब्दुल मुत्तलिब भी बहुत परेशान थें कि शायद अब अल्लाह की मर्ज़ी है कि अब्दुल्लाह को ज़बह कर दिया जाए_ और फिर इस आखिरी बार भी एक पर्ची पर सौ ऊंट लिखा गया और दूसरी तरफ हज़रत अब्दुल्ला का नाम लिखा गया और पर्ची उड़ाकर उठाई गई तो उसमें लिखा हुआ था कि ” सौ ऊंट ज़बह करो ” यह पढ़कर सबके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ उठी और सबने मिलकर एक बहुत तेज नारा लगाया और कहा कि चलो भाई अब अब्दुल्ला को छोड़ो और ऊंटों को ज़बह करो_ लेकिन अब्दुल मुत्तलिब ने कहा : नहीं नहीं, अभी एक बार और किया जाएगा..
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दोबारा पर्ची उड़ाई गई तो दोबारा भी यही निकला कि ” अब्दुल्ला को छोड़ो और ऊंटों को ज़बह करो_ सारे लोग खुश होकर कहने लगे चलो ऊंटों को ज़बह करो_ लेकिन अब्दुल मुत्तलिब ने कहा: नहीं, अभी एक बार और किया जाएगा.. और फिर तीसरी बार पर्ची उड़ाई गई तो तीसरी बार भी यही निकला कि अब्दुल्ला को छोड़ो और ऊंटों को ज़बह करो_ यह पढ़कर सारे लोग खुशी से झूम उठें और अब्दुल मुत्तलिब ने भी अपने बेटे अब्दुल्ला को गले से लगा लिया और फिर सौ ऊंट ज़बह किएं_


(जारी है…)


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