हुज़ूर (ﷺ) के नबी बनने से पहले लड़कियों को कैसे ज़िंदा दफन किया जाता था_?😭 prophet Life

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दोस्तों ! ये वीडियो सीरतुन नबी सीरीज़ का पंद्रहवां पार्ट है कि जिसमें बताया जाएगा कि हुज़ूर (ﷺ) के नबी बनने से पहले लोगों में कैसी गुमराहियां फैली हुई थीं, यहां तक कि एक सहाबी ने आकर हुज़ूर (ﷺ) को अपनी जाहिलिय्यत के ज़माने का एक क़िस्सा सुनाया कि कैसे उन्होंने 70 से ज़्यादा लड़कियों को ज़िंदा दफन कर दिया था, ताकि किसी को अपना दामाद ना बनाना पड़े_

उन सहाबी का नाम हज़रत ” दिह़या कलबी ” था, वो एक मर्तबा मदीना में हुज़ूर (ﷺ) की खिदमत में हाज़िर हुएं, और कहने लगें कि ऐ अल्लाह के रसूल ! मुझे हर वक्त एक बात का डर सताता रहता है कि जिसको लेकर मैं बहुत ज़्यादा परेशान रहता हूं, क्योंकि इस्लाम लाने से पहले मुझसे कुछ ऐसे गुनाह हो गएं हैं कि डर लगता है कि अल्लाह तआला मेरे उन गुनाहों को माफ करेगा या नहीं_?

ये सुनकर हुज़ूर (ﷺ) ने पूछा कि ऐ दिहया ! वो कौन सा गुनाह है कि जिसको लेकर तुम इतना परेशान रहते हो ? तो हज़रत दिहया (रज़ि) ने जवाब दिया कि ऐ अल्लाह के रसूल_

मैं अपनी कौम का सरदार था, आपके नबी बनने से पहले जब मेरी कौम गुमराही में पड़ी हुई थी तो उस वक्त हमारे इलाके में लड़कियों की पैदाइश पर उन्हें ज़िंदा दफन कर देने का रिवाज था, क्योंकि कोई भी किसी को अपना दामाद बनाना ज़िल्लत समझता था, मैंने खुद अपने हाथों से 70 से ज़्यादा लड़कियों को ज़िंदा दफन किया है_ इतना कहकर हज़रत दिहया (रज़ि) बहुत रोने लगें और फिर आगे का किस्सा सुनाया_

फरमाया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! एक दिन की बात है कि मुझे किसी दूसरे शहर तिजारती कामों से जाना था, उस वक्त मेरी बीवी हमल से थी और उसके पेट में मेरा बच्चा था, मेरा काम ऐसा था कि मुझे घर लौटते लौटते 7 साल गुज़र जातें, इसलिए जाते वक्त मैंने बीवी से कहा कि अगर हमारे घर लड़का पैदा हो तो उसकी अच्छे से तरबियत करना और उसे किसी कमी का एहसास ना‌ होने देना, और अगर लड़की पैदा हो तो उसे ज़िंदा ही दफन कर देना, मेरी कमाई का एक पैसा भी उस पर खर्च ना करना_

इतना कहकर मैं घर से निकल गया और कई सालों के लिए दूर एक शहर में जाकर तिजारत करने लगा, वक्त गुज़रता जा रहा था और मुझे अपने बीवी- बच्चे की कोई खबर नहीं थी, मैं तो दिल ही दिल खुश था कि मेरे घर तो लड़का पैदा हुआ होगा, लेकिन शायद अल्लाह को कुछ और ही मंज़ूर था, इसलिए जब मैं 7 साल के बाद अपने घर वापस लौटा तो बड़ी उम्मीदों के साथ घर का दरवाज़ा खटखटाया_

थोड़ी देर के बाद एक छोटी सी बच्ची ने आकर दरवाज़ा खोला, तो मैंने उसे देखकर पूछा कि ऐ लड़की ! तुम कौन हो? तो उस बच्ची ने जवाब दिया कि मैं इस घर के मालिक की बेटी हूं, ये सुनते ही मेरे होश उड़ गएं और गुस्से से मेरी आंखें लाल पड़ गई मैंने उस लड़की से कहा कि अगर तुम इस घर के मालिक की बेटी हो तो मैं इस घर का मालिक हूं_

जैसे ही मैंने ये बात कही तो वो बच्ची मेरी टांगों से चिमटकर खुश होने लगी और कहने लगी कि अब्बा जान ! आप मुझे छोड़कर कहां चले गए थें, मैं तो हर रोज़ आपको याद करती थी_

वो लड़की बराबर मेरी टांगों को पकड़कर बोलती जा रही थी, और मैं अंदर ही अंदर गुस्से की आग में जल रहा था, फिर एकदम मैंने उस लड़की को धक्का दिया और वो दूर जाकर गिरी, मैं गुस्से में घर के अंदर आया और बीवी से पूछने लगा कि आखिर ये बच्ची किसकी है? मेरा ये सवाल सुनकर बीवी रोने लगी तो मैं समझ गया, बहुत देर बाद बीवी ने रोते हुए जवाब दिया कि ऐ दिहया ! ये तुम्हारी ही बच्ची है, जिस वक्त तुम मुझे हमल से छोड़कर दूसरे शहर चले गए थें तो हमारे घर इसी बच्ची की पैदाइश हुई, देखो ना ये कितनी प्यारी है

हज़रत दिहया (रज़ि) हुज़ूर (ﷺ) को ये किस्सा सुनाते जा रहे थें और रोते जा रहे थें, हज़रत दिहया ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल ! हक़ीक़त में मेरी बच्ची बहुत खूबसूरत और प्यारी थी, मेरा दिल कर रहा था कि मैं उसे अपने सीने से लगाकर प्यार करूं, लेकिन अगले ही पल ख्याल आया कि अगर मैंने ऐसा किया और अपनी बच्ची को घर में ही रख लिया तो क़बीले वाले ताना देंगे कि ऐ दिहया ! तुम तो हमारे क़बीले के सरदार हो और आज तक तुम दूसरों की लड़कियों को दफन करते आए हो, अब जब अपनी लड़की का नंबर आया तो उसमें मोहब्बत दिखाने लगें, ये कैसा इंसाफ है_?

ऐ अल्लाह के रसूल ! उस वक्त मैं फैसले के दोराहे पर खड़ा था कि एक तरफ तो मेरे अंदर अपनी प्यारी सी 6 साल की बच्ची के लिए मोहब्बत उमढ रही थी, तो दूसरी तरफ क़बीले वालों के तानों का डर था, इसलिए आखिर मैंने फैसला कर ही लिया कि मैं अपनी इस बच्ची को ज़िंदा ही दफन कर दूंगा जैसा कि मेरे क़बीले का रिवाज है_ 

फिर मैंने घर के एक कोने से कुदाल उठाई और लड़की को गोद में लेकर बाहर की तरफ जाने लगा, तो मेरी बीवी ने दौड़कर मेरे पैर पकड़ लिएं और रोते हुए कहने लगी कि ऐ दिहया ! मैं तुम्हें अल्लाह का वास्ता देखती हूं, ये तुम्हारी ही तो बच्ची है इसे मत मारो, ऐ दिहया ! ये बहुत मासूम है और जब से तुम इसे छोड़ कर दूर गए हो तो ये हर रात मुझसे पूछा करती थी कि ऐ मेरी अम्मी ! मेरे अब्बा कहां हैं और वो कब आएंगे ?

मां तो आखिर मां होती है, वो कैसे बर्दाश्त कर सकती है कि उसकी ज़िंदा बच्ची को दफन कर दिया जाए, इसलिए मेरी बीवी बराबर मेरा पैर पकड़े रोती जा रही थी, लेकिन मैंने उसकी एक न सुनी और आखिर बीवी को धक्का देकर घर से बाहर निकल गया_

मेरी बेटी मेरी गोद में थी और दूसरे हाथ में फावड़ा था, मैं तेज़ी से कब्रिस्तान की तरफ बढ़ता जा रहा था, अचानक मेरी बेटी मुझसे पूछने लगी कि ऐ मेरे प्यारे अब्बा ! क्या आप मुझे नानी के घर ले जा रहे हैं ? ऐ मेरे अब्बा ! क्या आप मुझे खिलौने दिलाने ले जा रहे हैं_?

मेरी बच्ची मुझसे बराबर सवाल किए जा रही थी और मैं खामोश उसका कोई भी जवाब नहीं दे रहा था, आखिर चलते-चलते मैं कब्रिस्तान में पहुंचा और बच्ची को एक जगह बिठाकर पास ही गढ़ा खोदने लगा, धूप बहुत तेज़ थी इसलिए गढ़ा खोदते हुए मेरे सारे जिस्म से पसीना बह रहा था, मैं थक कर कभी थोड़ी देर के लिए दूर खड़ा हो जाता और फिर आकर गढ़ा खोदने लगता, मेरी प्यारी बच्ची पास बैठी ये सबकुछ देख रही थी_

अचानक वो मेरे पास आई और कहने लगीं कि ऐ मेरे अब्बा जान ! आप इतनी तेज़ धूप में काम क्यों कर रहे हैं, चलो हम लोग घर चलते हैं, और फिर वो बच्ची अपने दुपट्टे से मेरे चेहरे पर लगे पसीने को पोछने लगी और मेरे बालों में जो मिट्टी पड़ रही थी उसे वो अपने मासूम हाथों से झाड़ने लगी_ मेरी बच्ची मुझसे बार-बार कह रही थी कि ऐ मेरे अब्बा जान ! आप ऐसी धूप में मेहनत ना करें मुझे आपको परेशान होता देख बिल्कुल नहीं अच्छा लग रहा_

मेरी उस मासूम बच्ची को नहीं पता था कि मैं एक सख्त दिल बाप उसके साथ क्या करने जा रहा हूं, वो तो बेचारी दिल ही दिल खुश थी कि आज इतने सालों के बाद उसके वालिद दूर शहर से वापस आए हैं, लेकिन मैं अपनी बच्ची को देखकर खुश नहीं था इसलिए कड़ी धूप में भी तेज़ी से वो गड्ढा खोदता जा रहा था_

आखिर जब मैंने वो गड्ढा पूरी तरह खोद लिया, तो अपनी बच्ची को बहाने से पास बुलाकर उस गड्ढे में धक्का दे दिया, गड्ढे में गिरते ही मेरी बच्ची ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और कहने लगी कि ऐ मेरे अब्बा जान ! ये आप मेरे साथ आप क्या कर रहे हैं ? लेकिन मैंने एक बार भी उस पर तरस ना खाया और फावड़े से उस पर मिट्टी डालने लगा_

वो बच्ची रोते हुए कहे जा रही थी कि ऐ मेरे अब्बा जान ! मुझे मत मारो, मैं अब कभी भी आपसे खिलौने लाने को नहीं कहूंगी, ना कभी नानी के घर जाने को कहूंगी, मेरे प्यारे अब्बा ! मुझे माफ कर दो, मैं आपसे बहुत मोहब्बत करती हूं_

ऐ अल्लाह के रसूल ! उस वक्त मेरी मासूम बच्ची अपने छोटे-छोटे हाथ मेरी तरफ फैलाकर मुझसे रहम की भीख मांग रही थी और मुझ जैसे ज़ालिम बाप को एक बार भी उस पर तरस ना आया_

आखिर जब मेरी बच्ची मेरी तरफ से बिल्कुल मायूस हो गई तो उसने आसमान की तरफ नज़रें उठाकर कहा कि ऐ मेरे रब ! मैंने सुना है कि अब एक नबी आने वाला है कि जो बेटियों की इज्ज़त बचाएगा और लोगों को सही राह दिखाएगा, तो ऐ मेरे रब ! उस नबी को भेज दो, क्योंकि तेरी धरती पर मासूम बेटियों को ज़िंदा दफन किया जा रहा है_

वो सहाबी फरमाते हैं कि ऐ अल्लाह के रसूल ! मैं अपनी बच्ची पर मिट्टी डालता जा रहा था और आखिर मैंने उसे पूरी तरह ज़मीन में ज़िंदा ही दफन कर दिया, वो अंदर ही अंदर तड़पकर मर गई_

इतना वाक़िआ सुनाने के बाद वो सहाबी बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगें और कहने लगें कि ऐ अल्लाह के रसूल ! मेरे सर ये एक ऐसा गुनाह है कि जो मुझे हर वक्त परेशान करता रहता है कि आखिर कयामत में मेरा ये गुनाह माफ किया जाएगा या नहीं_?

हज़रत दिह़या (रज़ि) की ज़ुबान से ऐसा दर्दनाक वाक़िआ सुनकर हुज़ूर (ﷺ) भी इतना ज़्यादा रोएं कि आपकी दाढ़ी मुबारक आंसुओं से तर हो गई, और फिर आप (ﷺ) ने उन सहाबी से फरमाया कि ऐ दिह़या ! तुम अल्लाह से अपने इस गुनाह की तौबा करो, तुम्हारा रब बहुत माफ करने वाला है_

दोस्तों ! इसी तरह का एक और छोटा सा वाक़िआ किताबों में नज़र आता है कि ” हज़रत सअसआ बिन नाजिया ” नाम के एक मशहूर सहाबी ने ज़माना जाहिलिय्यत में तक़रीबन 360 से ज़्यादा बच्चियों को ज़िंदा दफन होने से बचाया था_ वो सहाबी खुद अपना वाक़िआ सुनाते हुए फरमाते हैं कि_

एक बार मेरी दो जवान ऊंटनियां कहीं खो गईं, तो मैं अपने एक की़मती ऊंट पर सवार होकर उन दोनों की तलाश में निकला, बहुत दूर जाकर एक सहरा में मुझे वो दोनों ऊंटनियां मिल गईं, तो मैं उन्हें लेकर वापस लौट रहा था कि मुझे एक जगह दो घर बने नज़र आएं, मैं पास गया तो वहां एक बूढ़े दादा बैठें मिले_

मैं उनसे बातें करने लगा कि तभी सामने के घर से आवाज़ आई कि ऐ बूढ़े बाबा ! आपके घर एक बच्चे की पैदाइश हुई है, तो उन बूढ़े बाबा ने पूछा कि लड़का पैदा हुआ है या लड़की ? तो जवाब मिला कि लड़की की पैदाइश हुई है, ये सुनते ही उस बूढ़े बाबा ने कहा कि उस लड़की को अभी फौरन दफन कर दो, मुझे अपने घर लड़की नहीं चाहिए_

बूढ़े बाबा की ऐसी बात सुनकर मेरे तो होश उड़ गएं और मैंने उनसे कहा कि ऐ बूढ़े दादा ! आप उस लड़की को दफन ना करें, बल्कि मुझे दे दें, मैं उसकी अच्छी परवरिश करूंगा_ ये सुनकर उस बुढे़ आदमी ने जवाब दिया कि तुम मुझे उसके बदले में क्या दोगे_?

तो मैंने कहा कि आप जो कुछ मांगोगे मैं वो सब देने को तैयार हूं, तो उस बूढ़े बाबा ने कहा कि ये अपनी दोनों जवान ऊंटनियां और ऊंट मुझे दे दो और उसके बदले में इस बच्ची को ले जाओ_

ये सुनकर मैंने बगैर सोचे समझे वो सारे ऊंट उनके हवाले कर दिएं और उस बच्ची को लेकर खुशी-खुशी अपने घर आ गया, फिर उसके बाद इस्लाम आने तक मैंने तकरीबन 360 से ज़्यादा बच्चियों को इसी तरह ज़िंदा दफन होने से बचाया और हर बच्ची के बदले मैंने दो ऊटनियां और एक जवान ऊंट दिया_

एक बार उन सहाबी ने हुज़ूर (ﷺ) से पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल ! क्या मुझे मेरी उन नेकियों का कोई बदला मिलेगा? तो हुज़ूर (ﷺ) ने फरमाया कि हां, तुम्हें उसका पूरा पूरा अज्र दिया जाएगा

दोस्तों ! ये दोनों वाक़िआत सुनाने का मकसद सिर्फ ये है कि आपको आगाह किया जाए कि हुज़ूर (ﷺ) के दुनिया में नबी बनकर आने से पहले लोगों के क्या हालात थें, जैसे हिंदू मज़हब में औरतों को ” सति ” होना पड़ता था इसी तरह अरबों की तहज़ीब में लड़कियों को ज़िंदा दफन कर दिया जाता था_

हुज़ूर (ﷺ) के नबी बनने से पहले औरतों की कोई भी इज्ज़त ना थी, बाप के मरने पर बेटे अपनी मां को ही बाजा़रों में जाकर बेच दिया करते थें, औरतों के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाता, हर महीने औरत के ख़ास दिनों में उन्हें एक कोठरी में बंद कर दिया जाता, और उसके हाथों की छुई हर चीज़ को हराम समझा जाता, और उन्हें खाना भी पैरों से लात मार कर कोठरी के बाहर से ही दिया जाता_

जब हुज़ूर (ﷺ) को इस दुनिया में नबी बनाकर भेजा गया तो आपने औरतों की इज्ज़त करना सिखाई, और फरमाया कि दुनिया में एक औरत ही है कि जिसके क़दमों तले अल्लाह ने जन्नत रख दी है, हुज़ूर (ﷺ) ने लोगों को ज़िंदगी गुज़ारने के तरीक़े सिखाएं और घटाठोप तारीकी से निकालकर लोगों को रोशनी की एक नई राह दिखाई_

(जारी है)


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