हमारे हुज़ूर (स.) और दूध पिलाने वाली औरतें {part-4}| Prophet Muhammad & Halima Sadiya

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Prophet Muhammad & Halima Sadiya

  मक्का से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक बस्ती थी जिसका नाम ” बनू साद ” था_ हुज़ूर (स.अ.) की पैदाइश के एक हफ्ते के बाद ” बनू साद ” की 10 औरतें अपनी अपनी सवारी लेकर मक्का की तरफ किसी दूध पीने वाले बच्चे की तलाश में निकलीं_ उस ज़माने में औरतों के लिए रोज़ी का यही एक ज़रिया था कि वो औरतें मालदार घरानों के बच्चों को अपने घर लाकर उन्हें दूध पिलातीं और फिर जब वो बच्चे थोड़ा बड़े हो जातें तो उन्हें उनके मां-बाप को वापस कर आती और इसके बदले में इन बच्चों के मां बाप दूध पिलाने वाली औरत को बहुत ज़्यादा पैसे और तोहफे देते थें…

इसी उम्मीद में ” बनू साद ” की 10 औरतें मक्का की तरफ अपनी ऊंटनियां लेकर चलीं , उन्हीं औरतों में हज़रत हलीमा सादिया भी थीं, हलीमा सादिया के घर बहुत ज़्यादा गरीबी थी, उनके शौहर को कोई काम ना मिलता, सिर्फ बकरी चरा कर उन्हीं के दूध पर दिन रात गुज़ारा होता था_ हलीमा सादिया के घर में एक ऊंटनी भी थी लेकिन वो बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो चुकी थी, क्योंकि ” बनू साद ” कबीले में घास भी बहुत कम उगती थी इसलिए जानवरों को भी सही से चारा नहीं मिल पाता था…

हलीमा सादिया अपनी उसी कमज़ोर ऊंटनी को लेकर मक्का की तरफ उन 10 औरतों के साथ चल पड़ी, ताकि उन्हें भी कोई दूध पीता बच्चा मिल जाए जिसकी वजह से उनके घर में भी चार पैसे आने लगें_ हलीमा सादिया के साथ उनका एक दूध पीता बच्चा और उनके शौहर थें…

उन औरतों की ऊंटनियां ताकतवर थी इसलिए वो बार-बार हलीमा सादिया की ऊंटनी से आगे निकल जातीं और फिर दूर जाकर उन औरतों को एक जगह पर रुकना पड़ता, ताकि हलीमा सादिया की कमज़ोर ऊंटनी भी धीरे-धीरे उनके पास पहुंच जाए और सारी औरतें एक साथ मक्का पहुंचें.. उन औरतों को बार-बार हलीमा सादिया के लिए रुकना पड़ता था इसलिए आखिर उन औरतों ने हलीमा सादिया से कहा कि ” ऐ हलीमा ! तुम्हारी वजह से हमें बार-बार रुकना पड़ता है, धूप भी बहुत तेज़ है इसलिए अगर तुम इजाज़त दो तो हम निकल जाएं और तुम धीरे-धीरे अपनी इसी ऊंटनी से आती रहना…

हलीमा सादिया बेचारी उस वक्त क्या जवाब देतीं? उन्होंने कह दिया कि ” हां, ठीक है तुम लोग मेरी वजह से परेशानी मत उठाओ, जाओ तुम सब निकल जाओ मैं अपने शौहर के साथ धीरे-धीरे पीछे आ रही हूं..

दो दिन के सफर के बाद ये 9 औरतें पहले ही मक्का पहुंच गई और मक्का में जितने भी मालदार घराने थे उनके घरों से कोई ना कोई दूध पीने वाला बच्चा ले लिया_ रिवायतों में आता है कि ये 9 औरतें सबसे पहले हमारे हुज़ूर (स.अ.) के घर आतीं लेकिन जब मालूम होता कि इस बच्चे का बाप नहीं है और ये बच्चा यतीम है तो वो उसे लेने से इनकार कर देतीं और कहती कि ” अरे हम इतनी दूर सफर करके इसलिए आए हैं ताकि बच्चे के बाप से हमें कुछ पैसे और खर्चा मिल जाए, ये बच्चा तो यतीम है इससे हमें क्या मिलेगा..” इसलिए सारी औरतों ने हमारे हुज़ूर (स.अ.) को लेने से इनकार कर दिया और मक्का के मालदार बच्चों को लेकर चली गई…

जब सभी औरतों ने हुज़ूर (स.अ.) को लेने से इंकार कर दिया तो ये बात हज़रत आमिना के दिल को लगीं और वो अकेली घर में बैठी अपने इस छोटे बच्चे को देखकर रोने लगीं और दिल ही दिल सोचने लगीं कि ” ऐ काश ! आज मेरे मासूम बच्चे के बाप ज़िंदा होते तो मेरे बच्चे को भी कोई औरत अपने घर ले जाती, ऐ काश ! मेरे शौहर ज़िंदा होते तो वो मेरे बच्चे को गोद में लेकर बाजा़रों में घुमाते और उसे अच्छे अच्छे खिलौने दिलातें…

हज़रत आमिना के आंसू देखकर शायद उस वक्त अल्लाह ताला हज़रत आमिना से कह रहे होंगे कि ” ऐ आमिना ! तुम परेशान क्यों होती हो, इस बच्चे के बाप उसे खिलौना लेकर नहीं दे पाएं तो क्या हुआ, इस बच्चे की तो ऐसी शान होगी कि मैं आसमान के चांद को इस बच्चे के लिए खिलौना बना दूंगा और वो उंगलियों के इशारे से चांद के दो टुकड़ेकर देगा, ऐ आमिना ! इस बच्चे के बाप इसे क्या बाजारों की सैर करवातें, आने वाले वक्त में देखना मैं इस बच्चों को आसमानों पर बुलाकर जन्नत की सैर करवाऊंगा…

हज़रत आमिना खामोश परेशान बैठी थीं और शायद यही सब बातें सोच रही थीं, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब को भी जब अपने पोते के बारे में ये खबर मालूम हुई कि किसी औरत ने भी मेरे पोते को कबूल नहीं किया है सबने लेने से इंकार कर दिया है, तो उनके भी दिल पर एक चोट लगी और दिल ही दिल सोचने लगें कि ऐ काश ! मेरा बेटा अब्दुल्ला ज़िंदा होता तो आज मेरे पोते को ये दिन ना देखना पड़ता…

शाम का वक्त हो चुका था_ हलीमा सादिया उसी वक्त मक्का पहुंची तो उन्हें मालूम हुआ कि अब मक्का में कोई मालदार घराने का बच्चा नहीं बचा है, इन सभी औरतों ने हर ऐसे बच्चे को ले लिया है जिसका बाप मालदार हो, हलीमा सादिया तलाश करती हुई हज़रत आमिना के घर पहुंचीं और दरवाज़ा खटखटाया_ पूछने पर बताया कि मैं दूध पिलाने वाली हूं , देहात से आई हूं बच्चा चाहिए..

हज़रत आमिना ने सोचा कि ये औरत भी अभी मेरे बच्चे को देखकर मना कर देगी कि मैं इस यतीम को गोद नहीं लेती, लेकिन फिर भी अल्लाह ने उनके दिल में बात डाली और उन्होंने हलीमा सादिया को घर के अंदर बुला लिया…

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हलीमा सादिया को भी जब इस बात की खबर हुई कि बच्चा यतीम है और इसका बाप नहीं है तो लेने से इनकार कर दिया और वापस चली गई, उन्हें कोई भी बच्चा नहीं मिला और वो अपने शौहर के पास एक खेमें में पहुंची_ शौहर ने पूछा कि ऐ हलीमा ! क्या हुआ ? कोई बच्चा नहीं मिला ? हज़रत हलीमा ने जवाब दिया कि ” नहीं, हम देर से पहुंचे इसीलिए मक्का के सारे बच्चे उन औरतों ने ले लिए और मेरी किस्मत में शायद कोई भी बच्चा नहीं है, लेकिन हां, एक घर में गई थी तो वहां एक यतीम बच्चा था , उसका बाप मर चुका है तो उससे हमें क्या मिलेगा, जब बाप ही नहीं तो फिर हमें पैसे और तोहफे कौन देगा ? इसलिए मैंने उस बच्चे को लेने से इनकार कर दिया…

रात का वक्त था_ दोनों मियां बीवी खामोश बैठे थें , हज़रत हलीमा की गोद में जो बच्चा था वो बहुत ज़्यादा रो रहा था क्योंकि वो दो दिनों से भूखा था और हज़रत हलीमा के सीने में बिल्कुल भी दूध नहीं बचा था, क्योंकि हज़रत हलीमा ने भी कई कई दिनों से कुछ नहीं खाया था इसलिए भूख की वजह से उनके सीने में भी दूध आना बंद हो गया था…

अचानक खामोशी तोड़ते हुए उनके शौहर ने अपनी बीवी हलीमा से कहा कि ऐ हलीमा ! वैसे भी हमें कोई बच्चा नहीं मिला है और हम इतनी दूर का सफर करके मक्का आए हैं, कल सुबह हमें वापस जाना है इसलिए मैं मुनासिब समझता हूं कि तुम जाओ और उसी यतीम बच्चे को ले आओ, चलो हमें कुछ पैसे नहीं मिलेंगे तो क्या हुआ कम से कम अल्लाह की तरफ से कुछ सवाब ही मिलगा कि हमने एक यतीम बच्चे को पाला, खाली हाथ घर लौटते हुए मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.. हज़रत हलीमा ने कहा कि ” बात तो आप सही कह रहे हो, ठीक है मैं अभी जाकर उस बच्चे को ले आती हूं और फिर हज़रत हलीमा बीबी आमिना के घर पहुंचीं..

ये देखकर हज़रत आमिना बहुत ज़्यादा खुश हुई कि चलो मेरे बच्चे को किसी औरत ने क़बूल तो किया, हज़रत हलीमा ने फरमाया कि ज़रा मुझे वो बच्चा तो दिखलाओ..! हज़रत आमिना ने ज़मीन पर लेटे एक बच्चे की तरफ इशारा कर दिया, उस हुज़ूर (स.अ.) के ऊपर एक कपड़ा पड़ा हुआ था, हज़रत हलीमा ने जैसे ही वो कपड़ा हटाकर हमारे हुज़ूर का चेहरा देखा तो उनका दिल धक से हो गया, हुज़ूर (स.अ.) ने मुस्कुराते हुए हज़रत हलीमा की उंगली पकड़ ली, ऐसा खूबसूरत बच्चा और उसकी इतनी प्यारी सी मुस्कुराहट देखकर हज़रत हलीमा खुद पर का़बू न कर सकीं और उस बच्चे को गोद में उठाकर सीने से लगा दिया, और उसे प्यार करने लगी..

बच्चे को सीने से लगाते ही हज़रत हलीमा को ऐसी ठंडक महसूस हुई कि जो उन्हें सारी ज़िंदगी में नहीं मिल सकी_ फिर हज़रत हलीमा ने कहा कि मैं इस बच्चे को ज़रूर लूंगी, हज़रत आमिना ने खुश होकर अब्दुल मुत्तलिब को बुलवाया और कहा कि एक औरत बच्चे को लेने आई है..

ये सुनकर अब्दुल मुत्तलिब भी खुश हुएं और जल्दी से घर पहुंचे, हज़रत हलीमा से पूछा कि ” तू किस क़बीले से है_? तो उन्होंने जवाब दिया कि ” बनू साद ” से हूं.. फिर पूछा कि तेरा नाम क्या है तो फरमाया कि मेरा नाम ” हलीमा सादिया है “… ये सुनकर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने खुश होकर कहा कि ” वाह भाई वाह ! नेकी और सादगी एक साथ जमा हो गई, उन्होंने हज़रत हलीमा की तारीफ की और फिर फरमाया कि तुम मेरे बच्चे को ले जा सकती हो…

हज़रत हलीमा जब बच्चे को लेकर आगे बढ़ने लगीं तो रुककर हज़रत आमिना से कहा कि ऐ आमिना ! मैं देहात की रहने वाली हूं मैंने आज तक इस जैसा खूबसूरत बच्चा देहातों में नहीं देखा_ हज़रत आमिना ने कहा कि ऐ हलीमा ! तुम देहात के रहने वाली हो और मैं शहर की रहने वाली हूं मैंने आज तक इस जैसा बच्चा शहरों में नहीं देखा…

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब पास खड़े थें, उन्होंने कहा कि ” ऐ हलीमा ! तुमने देहात में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा और ऐ आमीना ! तुमने शहरों में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा और मैं मुल्कों का सफर किया करता हूं मैंने मुल्कों में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा…

अगर उस वक्त हज़रत जिब्रील मौजूद होते तो शायद वो ये कहतें कि ” ऐ हलीमा ! तुमने देहातों में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा और ऐ आमिना ! तुमने शहरों में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा और ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! तुमने मुल्कों में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा और मैं जिब्रील सारी दुनिया का चक्कर लगाता हूं, मैंने सारी दुनिया में ऐसा खूबसूरत बच्चा नहीं देखा__ और अगर उस वक्त अल्लाह ताला से कोई पूछता तो शायद अल्लाह ताला फरमातें कि मैं इस बच्चे का परवरदिगार ! मैं सारी दुनिया का मालिक ! बादशाहो का बादशाह ! मैं इस बच्चे की कसम खाकर कहता हूं कि मैंने सारी मखलूक में इस बच्चे जैसा खूबसूरत किसी को पैदा ही नहीं किया…

हज़रत हस्सान ने हमारे हुज़ूर (स.अ.)की तारीफ करते हुए एक बार फरमाया था कि..

واحسن منك لم ترقط عيني
واجمل منك لم تلد النساء
خلقت مبرأ من كل عيب
كأنك قد خلقت كما تشاء
( ऐ हमारे हुज़ूर (स.अ.) ! आपसे ज़्यादा हसीन मैंने किसी को नहीं देखा, और आपसे ज़्यादा खूबसूरत इंसान किसी औरत ने नहीं पैदा किया, आप तो हर बुराई से पाक करके पैदा किए गएं , आप तो बिल्कुल वैसे ही पैदा किए गएं जैसा आपको होना चाहिए था)

हज़रत हलीमा सादिया हुज़ूर (स.अ.) को गोद में लेकर अपने शौहर के पास पहुंचीं, रात बहुत ज़्यादा हो चुकी थी, भूक भी बहुत ज़्यादा लग रही थी , वो छोटा बच्चा भूख से रो रहा था… हज़रत हलीमा ने हुज़ूर के बारे में सोचा कि इस छोटे बच्चे को अपने सीने से दूध पिलाकर तो देखूं शायद एक दो कतरे दूध इस बच्चे को मिल जाएं _ हज़रत हलीमा ने जैसे ही हुज़ूर (स.अ.) को अपने सीने से लगाया तो उनके सीने में देखते ही देखते दूध भरता गया, और हुज़ूर (स.अ.) ने पेट भरकर दूध पिया, फिर उस दूसरे बच्चे ने भी पेट भर कर दूध पिया.. हज़रत हलीमा और उनके शौहर ये देखकर बहुत हैरान थें कि आखिर ये सब हो क्या रहा है_?…

फिर हज़रत हलीमा ने अपने शौहर से कहा कि आप ये बर्तन लो और बाहर हमारी जो ऊंटनी खड़ी है उसके थनों में जाकर देखो, शायद थोड़ा बहुत दूध निकल आए ताकि हम लोग भी कुछ दूध पी लें और अपनी भूख मिटा सकें .. शौहर बर्तन को लेकर बाहर उस कमज़ोर ऊंटनी के पास पहुंचें तो देखकर हैरान रह गएं कि उस ऊंटनी के थन दूध से भरे हुए थें _ उन्होंने उसका दूध निकालना शुरू किया और पूरा बर्तन भर लिया..

जब वो दूध लेकर हज़रत हलीमा के पास पहुंचें तो हज़रत हलीमा भी हैरान रह गईं कि हमारी उस कमज़ोर ऊंटनी के अंदर से इतना ज़्यादा दूध कैसे निकला_ शौहर ने जवाब दिया कि ” ऐ हलीमा ! मुझे तो लगता है कि इस यतीम बच्चे के साथ अल्लाह की कोई ख़ास मदद है इसीलिए हमारे साथ ऐसे ऐसे अजूबे हो रहे हैं _ हज़रत हलीमा ने हुज़ूर ( स.अ.) को अपने गले से लगाते हुए कहा कि हां, मुझे भी लगता है ये मेरा चांद सा प्यारा बच्चा हमारे घर की सारी मुसीबतों को खत्म कर देगा…

सभी लोग दूध पीकर सो गए_ सुबह हुई तो शौहर ने अपने क़बीले ” बनू साद ” की तरफ लौटने की तैयारी शुरू कर दी, वो 9 औरतें पहले ही जा चुकी थीं और बहुत दूर निकल चुकी थीं , शौहर पहले ऊंटनी पर बैठ गएं और फिर खुद अपनी बीवी को अपने पीछे ऊंटनी पर बिठाया, हमारे हुज़ूर ( स.अ.) उस वक्त हज़रत हलीमा की गोद में थें_ उनके शौहर ऊंटनी को बार-बार खड़ा करने की कोशिश कर रहे थें लेकिन वो उठने का नाम ही नहीं ले रही थी_

परेशान होकर शौहर नीचे उतरें तो वो ऊंटनी एकदम से खड़ी हो गई, शौहर बहुत ज़्यादा हैरान हुए और फिर से ऊंटनी पर आगे बैठकर उसे चलाने की कोशिश करने लगें तो वो फिर से बैठ गई और उठने का नाम नहीं ले रही थी… शौहर को कुछ शक हुआ और उन्होंने हज़रत हलीमा से कहा कि ऐ हलीमा ! तुम इस बच्चे को लेकर आगे बैठो और मैं तुम्हारे पीछे बैठता हूं_ हज़रत हलीमा हुज़ूर (स.अ.) को लेकर जैसे ही आगे बैठीं तो वो ऊंटनी उठ खड़ी हुई और उसने ज़मीन पर सर रखकर तीन बार सजदा किया और अल्लाह का शुक्र अदा किया कि तूने मुझे हुज़ूर (स.अ.) की सबसे पहली सवारी बना दिया…

और फिर उस ऊंटनी ने एक दौड़ लगाई और बहुत तेज़ चलने लगी, हलीमा सादिया और उनके शौहर हैरान थें कि ये तो वही ऊंटनी है कि जिसे लेकर हम आए थें और जो चलने को तरसती थी, अब इसे क्या हो गया है कि ये इतनी तेज़ दौड़ रही है..

कुछ ही वक्त गुज़रा कि उस ऊंटनी ने दौड़ते हुए उन 9 औरतों को पा लिया और तेज़ी से चलते हुए उनके पास से गुज़री तो उन औरतों ने हैरानी से पूछा कि ऐ हलीमा ! क्या तुमने सवारी बदल दी है_? तो हज़रत हलीमा ने जवाब दिया कि मैंने सवारी नहीं बदली बल्कि इस सवारी का सवार बदल चुका है…

सबसे पहले हलीमा सादिया ही अपने मोहल्ले ” बनू साद ” में पहुंची, हज़रत हलीमा सादिया फरमाती हैं कि उस दिन मेरे पूरे मोहल्ले से गुलाबों की खुशबू आ रही थी, सारे मोहल्ले वाले हैरान थे कि आखिर ये खुशबू कैसे आ रही है_ ये अल्लाह की तरफ से हमारे हुज़ूर का उस क़बीले में इस्तिक़बाल हो रहा था….

(जारी है)



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