हज़रत खदीजा से निकाह के बाद हुज़ूर (ﷺ) के साथ क्या हुआ | Prophet Muhammad story

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Prophet Muhammad story

दोस्तों ! हुज़ूर (ﷺ) के ज़माने में काबा शरीफ के आसपास रहने वालों को ” कुरैश ” कहा जाता था, यही वो लोग थें जो काबा की देखभाल किया करते थें, ” कुरैश ” में उस वक्त बहुत से क़बीलें थें, हर कबीले वाले अपनी एक खास मूर्ति की पूजा किया करता था, और ये लोग अपनी उस मूर्ति को काबे के अंदर रखतें, इस तरह काबे में उस वक्त तकरीबन 350 से ज़्यादा मूर्तियां रखी हुई थी, क्योंकि ” कुरैश ” के लोग अल्लाह को सबसे बड़ा खुदा मानतें, लेकिन इन मूर्तियों को भी छोटे-छोटे खुदा तसव्वुर करते थें_

उस ज़माने में भी लोग हर साल हज करने दूर दूर से मक्का आया करतें थें, लेकिन उनके हज करने का तरीका बिल्कुल अलग था, वो इस तरह कि ये लोग अपने सारे कपड़े उतारकर काबे का तवाफ करतें, और हज के दिनों में जबतक हज मुकम्मल ना हो जाता ये लोग अपने घरों में असल दरवाज़े से दाखिल होना हराम समझते थें, इसलिए ज़रूरत पड़ने पर घर की छत फांदकर अंदर आतें, असल दरवाज़े से नहीं_ अब क्योंकि काबे के आसपास ” कुरैश ” के लोग ही बसा करते थें, इसलिए काबे की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर थी_

दूसरे शहरों से हज के लिए आने वाले लोग अपने साथ कुछ कीमती चीज़ें नज़राने के तौर पर लातें, और फिर उन्हें काबा के अंदर बने एक कुएं में डाल देतें, वो कुंआ सोने चांदी, व कीमती पत्थरों से भरा रहता_

एक बार रात के वक्त जब सभी ” कुरैश ” के लोग सो रहे थें, तो एक आदमी ने काबे के अंदर फांदकर उस कुएं से सोने जवाहरात चोरी करना चाहा, लेकिन उसी वक्त पीछे से उसे ऐसा धक्का लगा और वो मुंह के बल उस कुएं में जा गिरा, और उसकी मौत हो गई_

इस वाक़िए के बाद अल्लाह की तरफ से काबे के अंदर बने उस कुएं पर एक सांप आ बैठा, वो सांप हर वक्त उस कुएं की मुंडेर पर बैठा रहता और जो भी उस कुएं से कोई चीज़ चोरी करना चाहता तो वो सांप उसे डंसकर मार देता_

इस वाक़िए को अभी कुछ ही दिन गुज़रे थें कि एक बूढ़ी औरत अपने हाथ में आग लेकर काबे को लोबान की धूनी दे रही थी, कि तभी अचानक उस आग की एक चिंगारी काबे के पर्दे को जा लगी, चिंगारी लगते ही काबे का पर्दा ज़ोर से जलने लगा और देखते ही देखते पूरे काबा में आग लग गई, वैसे तो काबा की दीवारें पत्थर और गारे से बनी हुई थीं, लेकिन उस आग की लपट इतनी तेज़ थीं कि उसकी वजह से काबे की दीवारों में दरारें पड़ गईं_

कुछ दिनों बाद ” कुरैश ” के लोगों ने काबे की मरम्मत कराने को सोची, लेकिन पैसों की कमी की वजह से उस वक्त वो ये काम ना कर सकें_

जब हुज़ूर (ﷺ) की उम्र 35 साल हुई तो एक रोज़ अचानक मक्का में बहुत तेज़ बारिश हुई कि जिसकी वजह से हर तरफ सैलाब आ गया, वो पानी का सैलाब इतना तेज़ था कि उसकी वजह से हजा़रों घर गिरकर तबाह हो गएं, काबा की दीवारों पर भी उस सैलाब का बहुत असर पड़ा, उसकी दीवारों में तो पहले ही से दरारें पड़ चुकी थीं, और अब सैलाब के बाद तो काबा की दीवारें बिल्कुल ही कमज़ोर हो गई_

जब कुरैश के लोगों ने काबा की ये हालत देखी और उन्हें यकीन हो गया कि अब अगर हमने काबा की मरम्मत नहीं की तो कोई भी आंधी- तूफान आकर काबे को गिरा सकता है, तो उन्होंने फैसला किया कि अब सारे लोग जमा होकर काबा की दोबारा तामीर करेंगे_ आपस में मशवरा हुआ और जितना हो सका हर एक ने अपनी तरफ से पैसे जमा किएं_ कुछ औरतों ने अपने ज़ेवरात दिएं, और कुछ ने अपने घर का सामान देकर कहा कि इसे बेचकर इसके पैसे काबा की तामीर में लगा दिएं जाएं_

तामीर करने का सारा सामान लाया गया, और एक दिन मुक़र्रर करके सभी लोग उस दिन काबा के पास आकर जमा हुएं_ लेकिन अब सबसे बड़ा ये मसला ये था कि काबा की दीवारों को कुदाल लेकर गिराएगा कौन? कुरेश में से किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो आगे बढ़कर काबे की दीवारों पर कुदाल मारे, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर हमने ऐसा किया तो कहीं अल्लाह की तरफ से हमारे ऊपर कोई अज़ाब ना आ जाए

इस डर की सबसे बड़ी वजह ये थी कि आज से 40 साल पहले ” अबरहा ” नाम का एक बादशाह अपनी फौज के साथ काबे को गिराने आया था, लेकिन अल्लाह ने उस पर अपने कुछ परिंदों के ज़रिए ऐसा अज़ाब भेजा, कि ” अबरहा ” अपने पूरे लश्कर के साथ एक बेदर्दी की मौत मरा_ और अल्लाह ने सारी दुनिया के लिए उसे एक इबरत बना दिया कि जो भी मेरे काबे को गिराने की कोशिश करेगा, उसका यही हश्र होगा_

कुरैश के लोग भी इसीलिए डरे हुए थें कि अगर हमने काबे की दीवारों को गिराया, तो कहीं हम पर भी ” अबरहा ” की तरह अज़ाब ना आ जाए, इसलिए उनमें से कोई भी हिम्मत नहीं कर पा रहा था कि वो आगे बढ़कर काबा की दीवारों को गिराए, कई दिन इसी तरह गुज़र गएं_

आखिर एक दिन” वलीद बिन मुग़ीरह ” नाम के एक आदमी आगे बढ़ें, और अपनी कुदाल लेकर काबे की दीवारों के पास जाकर खड़े हो गएं, अचानक उसी वक्त काबे के अंदर बैठा वो सांप निकलकर बाहर आ गया, ये देख सभी लोग घबराकर पीछे हट गएं, लेकिन उसी वक्त अल्लाह ने एक परिंदे को भेजा और उसने इस सांप को अपने पंजों में पकड़कर दूर फेंक दिया_

ये देख सबकी जान में जान आई और फिर ” वलीद बिन मुग़ीरह ” ने कहा कि ऐ लोगो ! काबे को गिराने से हमारा मकसद किसी बुराई का नहीं, बल्कि हम तो काबे को एक नए सिरे से तामीर करना चाहते हैं, इसलिए मुझे पूरी उम्मीद है कि दीवारे गिराने से हम पर कोई अज़ाब ना आएगा_ इतना कहकर वलीद ने अपनी कुदाल से काबे की एक दीवार पर वार किया तो वो दीवार एक ही बार में नीचे गिर गई_

लेकिन कुरेश के लोगों ने उसी वक्त वलीद को रोक लिया और कहने लगें कि ऐ वलीद ! अब अगली कोई भी दीवार ना तोड़ना, बल्कि आज रात सभी लोग इंतज़ार करो, अगर हम पर अल्लाह की तरफ से कोई अज़ाब ना आया, तो इसका मतलब होगा कि अल्लाह भी यही चाहता है कि हम काबे की दोबारा तामीर करें, लेकिन अगर अल्लाह की तरफ से हम पर कोई अज़ाब आ गया तो हम काबा की तामीर को उसी जगह रोक देंगे और इस गिरी हुई दीवार को भी मरम्मत करके उसे वैसे ही सीधा कर देंगे_ ये सुनकर वलीद ने कहा कि ठीक है, ऐसा ही होना चाहिए, और फिर वो अपनी कुदाल लेकर नीचे उतर आया_

वो रात मक्का वालों ने बहुत डरते हुए गुजा़री, हर छोटी सी आहट पर वो सब घबराकर उठ बैठतें और डरने लगतें कि कहीं अल्लाह की तरफ से हम पर कोई अज़ाब तो नहीं आ गया? लेकिन जब रात सही सलामत गुज़र गई और काबे की दीवार गिराने वाले ” वलीद बिन मुगीरा ” के साथ कुछ भी ना हुआ, तो कुरैश के लोग समझ गएं कि शायद अल्लाह की भी यही मर्ज़ी है कि हम काबे को गिराकर उसे दोबारा तामीर करें

इसलिए सुबह उठकर सभी लोग अपने घरों से फावड़ा- कुदाल निकलें, और जाकर काबे की दीवारें गिराने लगें, उस वक्त काबे के ऊपर कोई छत नहीं थी बल्कि चारों तरफ सिर्फ दीवारें ही दीवारें थीं, इसलिए कुरैश के लोगों ने एक ही दिन में सभी दीवारों को गिरा दी_

लेकिन अब बारी थी दीवारों के नीचे पड़ी उस निव व बुनियाद की, कि जिसे आज से चार हज़ार साल पहले हज़रत इब्राहीम (अ) ने अपने हाथों से रखा था, इसलिए उन बुनियादों को तोड़ने की किसी में भी हिम्मत नहीं थी, लेकिन कुछ देर के बाद मशवरा करके सभी आगे बढ़ें और उन बुनियादो को खोदना शुरू कर दिया_

बुनियाद खोदते हुए कुरैश के लोगों को एक अजीब सी किताब मिली कि जिसमें ” सिरयानी ज़ुबान ” में कुछ लिखा हुआ था, कुरैश के लोग तो सिर्फ अरबी ज़ुबान ही जानतें थें, उन्हें ” सिरयानी ज़ुबान ” के बारे में बिल्कुल भी पता ना था, इसलिए उन्होंने एक यहूदी को अपने इलाक़े में बुलाकर उसके सामने ये किताब पेश की, और पूछा कि आखिर इस किताब में क्या लिखा है_?

तो उस यहूदी ने पढ़कर सुनाया कि इस किताब में लिखा है कि ” मैं ही अल्लाह हूं, और इस काबे का मालिक हूं, मैंने ही इस काबे को उस दिन बनाया था कि जिस दिन मैंने आसमान व ज़मीन को पैदा किया, और चांद सूरज को उनकी असली शक्ल दी” ये सुनकर कुरैश के लोग बहुत हैरान हुएं और उन्होंने इस किताब को बड़ी ही हिफाज़त के साथ उसी जगह रख दिया

काबे की बुनियाद खोदते- खोदते वो लोग ज़मीन में उस हरे रंग के पत्थर तक पहुंच गएं कि जिसे हज़रत इब्राहीम (अ) ने काबे की बुनियाद में रखा था, अब जैसे ही एक आदमी ने उस हरे रंग के पत्थर पर अपनी कुदाल मारी, तो अचानक एक बहुत ज़ोर का धमाका पूरे मक्का में गूंजा, और ज़मीन हिलने लगी, ये देख सारे कुरैश के लोग हटकर दूर खड़े हो गएं, और उस आदमी को भी पीछे की तरफ घसीट लिया कि जिसने उस हरे रंग के पत्थर पर अपनी कुदाल मारी थी_

(जारी है


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